अध्याय १

अर्जुन-विषाद योग

कुरुक्षेत्र की वह विशाल, पावन भूमि — जिसे स्वयं धर्मक्षेत्र कहा गया — उस दिन युद्ध के लिए सर्वथा सज्जित हो चुकी थी। दोनों ओर की विशाल सेनाएँ, अपने-अपने रथों, गजों, अश्वों और पदातियों सहित, आमने-सामने पंक्तिबद्ध खड़ी थीं। शंख, नगाड़े, भेरियाँ अभी मौन थीं, किंतु वातावरण में एक असहनीय तनाव व्याप्त था, मानो सम्पूर्ण सृष्टि ही किसी महाप्रलय की प्रतीक्षा में साँस रोके खड़ी हो। हस्तिनापुर के राजमहल में, इस समस्त दृश्य से सैकड़ों योजन दूर बैठे अंधे राजा धृतराष्ट्र का हृदय, फिर भी, उतना ही व्याकुल था जितना कि वहाँ रणभूमि में उपस्थित किसी योद्धा का। वे जन्मांध थे, किंतु उनकी यह अंधता केवल नेत्रों तक सीमित न थी — वे वर्षों से अपने पुत्र दुर्योधन के अन्याय, उसके छल, उसके अधर्म को भी देखने से इनकार करते रहे थे। विदुर ने उन्हें कितनी ही बार सचेत किया, भीष्म ने कितनी ही बार समझाया, किंतु पुत्र-मोह में अंधे उस पिता ने हर बार आँखें मूँद लीं। अब जब युद्ध टलना असम्भव हो चुका था, तो उसी दबे हुए भय और अपराध-बोध के साथ उन्होंने अपने सारथी संजय को बुलाकर पूछा — कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र होकर, युद्ध की इच्छा से उद्यत होकर, आखिर मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया। संजय, जिन्हें महर्षि वेदव्यास की असीम कृपा से एक ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी कि वे बिना वहाँ उपस्थित हुए भी कुरुक्षेत्र के रणभूमि का प्रत्यक्ष दृश्य देख और वर्णन कर सकते थे, उन्होंने अंधे राजा के समक्ष उस भीषण दृश्य का वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि जब राजा दुर्योधन ने पाण्डव-सेना की सुव्यवस्थित, सुगठित व्यूह-रचना को अपनी आँखों से देखा, तो भीतर ही भीतर एक अनकहा भय उसके हृदय में समा गया। अपने इस भय को छिपाते हुए, वह अपने आचार्य द्रोण के समीप पहुँचा और अत्यंत सतर्क शब्दों में उनसे कहने लगा कि हे आचार्य, देखिए आपके ही प्रतिभाशाली शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा किस कुशलता से पाण्डवों की यह विशाल सेना व्यूहबद्ध की गई है। इसके पश्चात्, अपने भीतर के भय को दबाने और अपनी ही सेना का मनोबल बढ़ाने के प्रयास में, दुर्योधन ने एक-एक करके अपनी सेना के प्रमुख महारथियों के नाम गिनाने आरम्भ किए — पितामह भीष्म, महारथी कर्ण, कृपाचार्य, विकर्ण, सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा, सैंधव नरेश जयद्रथ, तथा और भी अनगिनत वीर, जो सब अपने प्राणों की परवाह किए बिना, केवल उसके ही लिए युद्ध में प्राण देने को उद्यत थे। अंत में उसने विशेष आग्रह के साथ द्रोणाचार्य से कहा कि आप सब मिलकर सभी दिशाओं से पितामह भीष्म की ही रक्षा करें, क्योंकि उन्हीं के बल पर यह सम्पूर्ण सेना टिकी हुई है। दुर्योधन का यह आग्रह सुनकर, वयोवृद्ध कुरु-पितामह भीष्म ने, अपने प्रिय पौत्र का उत्साह बढ़ाने की मंशा से, अत्यंत उच्च स्वर में सिंहनाद के समान अपना शंख बजाया। उस अकेले शंखनाद के पश्चात् ही मानो सम्पूर्ण कौरव-सेना में एक साथ प्राण फूँक दिए गए हों — शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और गोमुख नामक बाजे, सब एक साथ बज उठे, और उनकी वह तुमुल, कर्णभेदी ध्वनि दिशाओं को कंपाती हुई आकाश तक जा पहुँची। इसके प्रत्युत्तर में, पाण्डव-सेना की ओर से भी उतनी ही भव्यता के साथ उत्तर दिया गया। श्वेत अश्वों से युक्त उस दिव्य, विशाल रथ पर, जिसके सारथी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे, बैठे हुए माधव और पार्थ ने अपने-अपने अलौकिक शंख बजाए — श्रीकृष्ण ने पांचजन्य, तथा अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख। इसके पश्चात् वृकोदर भीम ने अपना भीषण पौण्ड्र शंख बजाया, कुंती-पुत्र युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, तथा नकुल और सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। इनके अतिरिक्त काशिराज, शिखण्डी महारथी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, तथा सुभद्रा-पुत्र महाबाहु अभिमन्यु — इन सबने भी, चारों ओर से, अपने-अपने शंख बजाकर उस युद्ध-घोष का समर्थन किया। उस भीषण, समवेत ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी दोनों को कंपा दिया, तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को भी मानो चीरकर रख दिया। तत्पश्चात् कपिध्वज अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठाया, और युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले, हृषीकेश श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे उनके रथ को दोनों सेनाओं के ठीक मध्य में स्थिर करें, ताकि वे स्वयं अपनी आँखों से यह देख सकें कि युद्ध की इच्छा रखने वाले वे कौन-कौन योद्धा हैं, जिनके साथ उन्हें यह घोर संग्राम करना है, और यह भी कि इस युद्ध-भूमि में एकत्रित होकर, दुर्बुद्धि दुर्योधन का साथ देने वाले वे कौन-कौन लोग हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस अनुरोध को तत्काल स्वीकार करते हुए, उस भव्य रथ को भीष्म, द्रोण तथा समस्त उपस्थित राजाओं के ठीक सम्मुख, दोनों सेनाओं के मध्य में लाकर स्थिर कर दिया, और पार्थ से कहा — हे पार्थ, देख, यहाँ एकत्रित हुए इन समस्त कुरुवंशियों को भलीभाँति देख ले। और जैसे ही अर्जुन ने उस स्थान से अपनी दृष्टि दौड़ाई, उन्होंने दोनों ही पक्षों में खड़े अपने समस्त बन्धु-बान्धवों को एक साथ देखा — पितामह और पितृतुल्य वयोवृद्ध जन, गुरुजन और आचार्यगण, मामा और मातुल, भ्राता और सहोदर, पुत्र और पौत्र, सखा और मित्र, तथा श्वसुर और सुहृद — इन सबको उन्होंने युद्ध हेतु पूर्णतः सन्नद्ध होकर, दोनों ही सेनाओं में खड़ा पाया। जिस पितामह भीष्म की गोद में खेलकर वे बड़े हुए थे, जिस आचार्य द्रोण से उन्होंने धनुर्विद्या की समस्त कला सीखी थी, जिन मामा शल्य और अन्य आत्मीयजनों के साथ उनका बचपन बीता था — वे सब आज उनके ही विरुद्ध शस्त्र उठाए खड़े थे। उधर कृपाचार्य भी खड़े थे, जिनकी गोद में कभी कौरव और पाण्डव, दोनों ही एक साथ खेला करते थे। पितामह के ठीक निकट, वयोवृद्ध सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा, तथा सिन्धु-देश के अभिमानी नरेश जयद्रथ भी खड़े दिखाई दिए, जिनके साथ किसी समय अर्जुन का मधुर सम्बन्ध रहा था। दूसरी ओर, अपने ही भतीजों — दुर्योधन के उन असंख्य छोटे भाइयों — को भी उन्होंने पहचाना, जिन्हें उन्होंने बालक्रीड़ाओं में स्वयं गोद में उठाया था, और जो आज कवच-कुण्डल धारण किए, हाथों में शस्त्र लिए, उन्हीं के प्राण लेने को उद्यत खड़े थे। यह दृश्य देखते ही कौन्तेय अर्जुन का हृदय गहन करुणा से भर उठा, और अत्यंत विषादपूर्ण स्वर में उन्होंने अपने सखा श्रीकृष्ण से कहना आरम्भ किया। उस क्षण अर्जुन के शरीर में एक विचित्र-सी दुर्बलता व्याप्त होने लगी। उनके अंग-प्रत्यंग शिथिल पड़ने लगे, कण्ठ और मुख सूखने लगे, सम्पूर्ण शरीर थर-थर काँपने लगा, और रोमांच होने लगा। हाथ से वह गांडीव धनुष, जो कभी उनकी भुजाओं में स्थिर रहता था, अनायास ही फिसलने लगा। त्वचा में एक असहनीय जलन उत्पन्न होने लगी, वे अपने ही पैरों पर खड़े रहने में असमर्थ अनुभव करने लगे, और उनका मन भ्रमित होकर चारों दिशाओं में भटकने लगा। साथ ही, उन्हें अनेक अपशकुन भी दिखाई देने लगे, जो आगे किसी महान अनर्थ की सूचना दे रहे थे। इस असहनीय मानसिक और शारीरिक पीड़ा से व्याकुल होकर, अर्जुन ने अंततः श्रीकृष्ण से कहा कि हे केशव, अपने ही इन स्वजनों को युद्धभूमि में युद्ध की इच्छा से सम्मुख खड़ा देखकर, मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं, और मुख सूखा जा रहा है। अर्जुन ने आगे अत्यंत मार्मिक शब्दों में अपनी वेदना व्यक्त की — उन्होंने कहा कि इस युद्ध में मुझे किंचित् मात्र भी कल्याण दिखाई नहीं देता। न मुझे विजय की कामना है, न राज्य की, और न ही इस संसार के किसी सुख-भोग की। हे गोविन्द, वह राज्य, वह सुख, अथवा यह जीवन भी अंततः किस काम का, जब इसे पाने के लिए ही जिनके लिए हम राज्य, सुख और भोग चाहते हैं — वे ही गुरुजन, पितामह, चाचा, पुत्र, पौत्र, श्वसुर तथा अन्य समस्त सम्बन्धी — आज अपने प्राणों और धन-सम्पत्ति का मोह त्यागकर, इस रणभूमि में हमारे ही विरुद्ध खड़े हैं। उन्होंने आगे कहा कि हे मधुसूदन, ये सब भले ही मुझे मार डालें, तो भी मैं इन्हें मारने की इच्छा नहीं रखता — त्रिलोक के राज्य के लिए भी नहीं, तो फिर इस पृथ्वी के एक छोटे-से राज्य के लिए तो प्रश्न ही कहाँ उठता है। धृतराष्ट्र के इन पुत्रों का वध करके हमें कौन-सा सुख प्राप्त होगा? इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा। अर्जुन का यह तर्क आगे भी उतनी ही गहनता के साथ चलता रहा। उन्होंने कहा कि अतः हे माधव, अपने ही बन्धुजन — धृतराष्ट्र के पुत्रों — को मारना हमारे लिए किसी भी प्रकार उचित नहीं है, क्योंकि अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? भले ही लोभ से आविष्ट हुए वे लोग कुल-नाश से उत्पन्न दोष और मित्र-द्रोह के पाप को न देख पा रहे हों, किंतु हे जनार्दन, हम, जो कुल-क्षय के इस भीषण दोष को भलीभाँति देख रहे हैं, हमें इस पाप से विमुख क्यों नहीं हो जाना चाहिए? उन्होंने इस तर्क को और भी गहराई तक विस्तारित किया — कुल के नाश होने पर, सनातन कुल-धर्म भी सदा के लिए नष्ट हो जाता है, और धर्म के नष्ट होते ही, सम्पूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है। अधर्म की इस प्रबलता से कुल की स्त्रियाँ दूषित होती हैं, और स्त्रियों के दूषित होने से वर्ण-संकर सन्तानें उत्पन्न होती हैं — जो कुल और कुल-नाशकों, दोनों को ही नरक में ले जाती हैं। इन वर्ण-संकर सन्तानों के कारण, पितरों को दिया जाने वाला पिंडदान और तर्पण भी लुप्त हो जाता है, जिससे पितृगण भी अपने स्थान से च्युत होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं। कुल-घातकों के इन्हीं दोषों से सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म दोनों नष्ट हो जाते हैं, और जिन मनुष्यों के कुल-धर्म इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, उनका निवास अनिश्चित काल तक नरक में ही होना कहा गया है। अर्जुन ने यह भी जोड़ा कि हे जनार्दन, हमने तो बचपन से यही सुना है कि जिस कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं, उस कुल के लोग सदा के लिए नरक में ही निवास करते हैं — तो फिर आज हम स्वयं ही, राज्य-सुख के लोभ में, अपने ही हाथों अपने कुल का यह घोर नाश करने को क्यों उद्यत हो गए हैं? क्या यह अत्यंत आश्चर्य और शोक की बात नहीं कि हम, जो बड़े-बड़े पाप कर्मों के फल को भलीभाँति समझते हैं, फिर भी इस राज्य-लोभ के वशीभूत होकर, अपने ही बन्धुओं के वध जैसे महापाप में प्रवृत्त हो रहे हैं? इतना कहते-कहते अर्जुन शोक-विह्वल हो उठे, और अत्यंत खेद के साथ बोले — हाय, कितने बड़े पाप का कार्य करने का हमने निश्चय किया है, कि राज्य और सुख के लोभ में आकर हम अपने ही स्वजनों का वध करने को उद्यत हो गए हैं! इससे तो कहीं अच्छा यह होगा कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र-पुत्र, निःशस्त्र और प्रतिकार न करने वाले मुझे रणभूमि में मार डालें, बजाय इसके कि मैं इस प्रकार अपने ही परिजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाऊँ। इस प्रकार कहकर, इस असहनीय शोक और गहन मानसिक द्वंद्व से पूर्णतः अभिभूत होकर, अर्जुन ने अपना धनुष-बाण रणभूमि के उसी रथ पर त्याग दिया, और शोक-संतप्त मन के साथ रथ के पिछले भाग में जा बैठे। सूत, संजय की वाणी में, इस दृश्य का वर्णन करते हुए, वहाँ हस्तिनापुर के राजसभा में भी मानो एक क्षण के लिए सन्नाटा-सा छा गया। स्वयं धृतराष्ट्र, यद्यपि नेत्रहीन थे, फिर भी संजय के इन शब्दों को सुनकर भीतर ही भीतर काँप उठे, क्योंकि जिस पुत्र-मोह के कारण उन्होंने कभी दुर्योधन को अधर्म के मार्ग से नहीं रोका था, उसी मोह का परिणाम अब उनके सामने साक्षात् प्रकट हो रहा था — कि उनका ही पुत्र, आज इस विनाशकारी युद्ध का प्रत्यक्ष कारण बनकर खड़ा था, और उसके विरुद्ध स्वयं धर्म और सत्य साक्षात् अर्जुन का साथ दे रहे थे। संजय ने आगे बताया कि अर्जुन का यह विषाद कोई क्षणिक दुर्बलता नहीं थी, अपितु एक ऐसे महान, धर्मपरायण मन का सहज उद्वेग था, जो अपने ही रक्त-सम्बन्धियों का वध करने की कल्पना मात्र से चूर-चूर हो उठा था। वे यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि इस भीषण दुविधा से निकलने का मार्ग आखिर कहाँ है — एक ओर क्षत्रिय-धर्म उन्हें युद्ध के लिए ललकार रहा था, तो दूसरी ओर स्नेह और करुणा उनके हाथ-पाँव बाँधे दे रही थी। इसी असहनीय अन्तर्द्वंद्व में डूबे, शोक-संतप्त अर्जुन को देखकर स्वयं माधव भी मौन होकर उनकी ओर देखने लगे, मानो प्रतीक्षा कर रहे हों कि यह विषाद अपनी चरम सीमा तक पहुँचे, ताकि वे आगे उसका सर्वथा समाधान प्रस्तुत कर सकें। यही वह अत्यंत मार्मिक, निर्णायक क्षण था — जब एक महान योद्धा, कर्तव्य और स्नेह के बीच फँसकर, पूर्णतः असहाय हो उठा — जिसने आगे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए जाने वाले उस अमर, कालजयी उपदेश की पृष्ठभूमि रची, जिसे संसार आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जानेगा — एक ऐसा उपदेश, जो केवल अर्जुन के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए, धर्म, कर्तव्य और आत्मज्ञान का शाश्वत मार्गदर्शक बनने वाला था।