अध्याय २

सांख्य योग

अर्जुन को इस प्रकार करुणा और शोक से पूर्णतः अभिभूत, आँसुओं से भरे नेत्रों वाला, तथा अत्यंत विषादग्रस्त देखकर, मधुसूदन श्रीकृष्ण ने उनसे कहना आरम्भ किया। उनके स्वर में स्नेह भी था और एक हल्की-सी चुनौती भी — उन्होंने पूछा कि हे अर्जुन, इस विषम बेला में, ऐसे कठिन अवसर पर, तुम्हारे मन में यह अनार्य-जनोचित, स्वर्ग को न देने वाली, तथा अपकीर्ति उत्पन्न करने वाली दुर्बलता आखिर कहाँ से आ गई है? हे पार्थ, इस प्रकार की नपुंसकता को अपने भीतर मत आने दो — यह तुम्हारे स्वभाव के सर्वथा विपरीत है। हे परन्तप, हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर, युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। किंतु अर्जुन का मन अभी भी उसी गहन दुविधा में डूबा हुआ था। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि हे मधुसूदन, मैं रणभूमि में बाणों से पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण जैसे पूजनीय जनों का सामना, आखिर कैसे करूँ? इनकी हत्या करने की अपेक्षा तो इस संसार में भिक्षा माँगकर जीवन-यापन करना कहीं श्रेयस्कर होगा, क्योंकि इन गुरुजनों का वध करके प्राप्त किया गया राज्य-सुख, अंततः रक्त से सना हुआ ही होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे यह भी ज्ञात नहीं कि हमारे लिए इन्हें जीतना बेहतर होगा, अथवा इनके द्वारा पराजित हो जाना — क्योंकि जिन धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारकर हमें जीवित रहने की भी इच्छा नहीं रहेगी, वे ही आज हमारे सम्मुख खड़े हैं। इस प्रकार करुणा के दोष से अपने स्वभाव को पूर्णतः अभिभूत पाकर, तथा धर्म के विषय में अपने मन को भ्रमित अनुभव करते हुए, अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि जो निश्चित रूप से श्रेयस्कर हो, वही मुझे स्पष्टतः बताइए। उन्होंने स्वयं को श्रीकृष्ण का शिष्य घोषित करते हुए कहा — मैं आपकी शरण में आया हुआ आपका शिष्य हूँ, कृपया मुझे शिक्षा दीजिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस पृथ्वी पर निष्कण्टक, समृद्ध राज्य प्राप्त होने पर, अथवा देवताओं के अधिपत्य को पाकर भी, मुझे ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके। इतना कहकर, अर्जुन ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, और इसके पश्चात् वे पूर्णतः मौन हो गए। तब गुड़ाकेश अर्जुन को, दोनों सेनाओं के ठीक मध्य में इस प्रकार शोक-संतप्त देखकर, हृषीकेश श्रीकृष्ण ने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए, उन्हें सम्बोधित करना आरम्भ किया — और यहीं से आरम्भ हुआ वह अमर उपदेश, जो आगे चलकर सम्पूर्ण मानवता के लिए दिव्य ज्ञान का स्रोत बनने वाला था। श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन, तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो, जिनके लिए शोक करना उचित नहीं है, जबकि तुम्हारे शब्द ज्ञानियों जैसे प्रतीत हो रहे हैं। वस्तुतः जो सच्चे ज्ञानी हैं, वे न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं, और न ही मृतकों के लिए। उन्होंने आगे समझाया कि ऐसा कोई भी काल नहीं था, जब मैं, तुम, अथवा ये सभी राजा लोग विद्यमान नहीं थे, और न ही ऐसा कोई काल आगे आएगा, जब हम सब विद्यमान नहीं रहेंगे — यह आत्मा सदा से थी, सदा है, और सदा रहेगी। जिस प्रकार इस देह में स्थित आत्मा को बाल्यावस्था, युवावस्था, तथा वृद्धावस्था — इन तीनों में से गुजरना पड़ता है, उसी प्रकार मृत्यु के समय वह किसी अन्य शरीर को प्राप्त होती है — इस सत्य को जानकर, धीर पुरुष कभी मोहित नहीं होते। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों से संयोग होने पर ही, शीत-उष्ण, सुख-दुःख जैसी अनुभूतियाँ उत्पन्न होती हैं — किंतु ये सब क्षणभंगुर हैं, आती-जाती रहती हैं, अतः हे भारत, इन्हें सहन करना ही श्रेयस्कर है। जो धीर पुरुष इन सुख-दुःखों से विचलित नहीं होता, तथा दोनों में समान भाव रखता है, वही अमरत्व को प्राप्त होने योग्य है। उन्होंने यह गहन सत्य भी बताया कि जो असत् है, उसका कभी अस्तित्व नहीं होता, और जो सत् है, उसका कभी अभाव नहीं होता — तत्त्वदर्शी ऋषियों ने इन दोनों की गहन परीक्षा करने के पश्चात् ही यह निष्कर्ष निकाला है। यह जो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त तत्त्व है, उसे अविनाशी जानो — इस अविनाशी आत्मा को कोई भी नष्ट करने में समर्थ नहीं है। इस शाश्वत, अविनाशी, अप्रमेय आत्मा के ये नश्वर शरीर ही नष्ट होते कहे जाते हैं, अतः हे भारत, तुम युद्ध करो। इसी क्रम में श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत गूढ़ रहस्य भी उद्घाटित किया, जो आगे चलकर संसार में सर्वाधिक स्मरण किया जाने वाला उपदेश बना — जो यह समझता है कि आत्मा किसी को मारती है, तथा जो यह समझता है कि आत्मा मारी जाती है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं, क्योंकि आत्मा न तो किसी को मारती है, और न ही स्वयं मारी जाती है। यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है — एक बार अस्तित्व में आकर, यह फिर कभी अभाव को प्राप्त नहीं होती। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर भी, यह कभी नहीं मारी जाती। जिस प्रकार मनुष्य पुराने, जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार यह देहधारी आत्मा भी जीर्ण शरीरों को त्यागकर, नए शरीरों में प्रवेश करती है। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, तथा वायु सुखा नहीं सकती — यह अच्छेद्य है, अदाह्य है, अक्लेद्य है, तथा शोषरहित है; यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल तथा सनातन है। यह अव्यक्त, अचिन्त्य तथा अविकार्य कही गई है — इस सत्य को जानकर, तुम्हें शोक करना उचित नहीं है। और यदि तुम यह भी मान लो कि यह आत्मा निरन्तर जन्म लेती और मरती रहती है, तो भी हे महाबाहु, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए — क्योंकि जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर चुका है, उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है, अतः इस अपरिहार्य विषय पर शोक करना उचित नहीं। समस्त प्राणी जन्म से पूर्व अव्यक्त होते हैं, मध्य में व्यक्त होते हैं, तथा मृत्यु के पश्चात् पुनः अव्यक्त हो जाते हैं — इसमें विलाप करने योग्य क्या है? इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उनके अपने ही स्वधर्म का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि अपने क्षत्रिय-धर्म को ध्यान में रखते हुए भी, तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई श्रेयस्कर कर्तव्य नहीं है। सौभाग्यशाली हैं वे क्षत्रिय, जिन्हें बिना माँगे ही, स्वर्ग के द्वार खोलने वाला ऐसा युद्ध सहज ही प्राप्त हो जाता है। यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने ही स्वधर्म और कीर्ति को त्यागकर, पाप के भागी बनोगे। लोग तुम्हारी सदा के लिए अपकीर्ति का वर्णन करेंगे, और जिस व्यक्ति का सदा सम्मान हुआ हो, उसके लिए अपयश, मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी होता है। महारथी योद्धा यह समझेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से विमुख हुए हो, और जिनकी दृष्टि में तुम्हारा अत्यंत आदर था, वे ही तुम्हें तुच्छ समझने लगेंगे। तुम्हारे शत्रु तुम्हारे पराक्रम की निन्दा करते हुए, अनेक अकथनीय शब्द कहेंगे — इससे अधिक कष्टदायक और क्या होगा? यदि तुम युद्ध में मारे गए, तो स्वर्ग को प्राप्त होगे, और यदि विजयी हुए, तो इस पृथ्वी का सुख भोगोगे — अतः हे कुन्तीपुत्र, युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक और भी गहन, कालजयी शिक्षा दी — सुख-दुःख, लाभ-हानि, तथा जय-पराजय — इन सबको समान समझकर युद्ध में प्रवृत्त हो जाओ, इस प्रकार तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा। यह जो ज्ञान अभी तक कहा गया, वह सांख्य-दृष्टि से था — अब उसी को योग की दृष्टि से भी सुनो, जिससे युक्त होकर तुम कर्म के बन्धन को सर्वथा काट सकोगे। इस मार्ग पर किया गया प्रयत्न कभी व्यर्थ नहीं जाता, और न ही इसमें कोई प्रतिकूल फल प्राप्त होता है — इस धर्म का थोड़ा-सा भी अभ्यास, महान भय से रक्षा करता है। इस मार्ग पर, दृढ़ निश्चय वाली बुद्धि केवल एक ही होती है, किंतु जिनकी बुद्धि अस्थिर है, उनके विचार अनंत शाखाओं में बँटे रहते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे उन लोगों की भी आलोचना की, जो वेदों के मात्र फूलों-जैसे, कर्मकाण्डपरक वचनों में ही रमे रहते हैं, तथा यह मानते हैं कि स्वर्ग-प्राप्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। भोग और ऐश्वर्य के प्रति आसक्त, तथा इच्छाओं से भरे उनके मन की, समाधि में स्थिर बुद्धि कभी नहीं बन पाती। वेद मुख्यतः प्रकृति के तीन गुणों से सम्बन्धित विषयों का वर्णन करते हैं — श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इन तीनों गुणों से ऊपर उठने, द्वंद्वों से रहित होने, सदा सत्त्व में स्थित रहने, योग-क्षेम की चिंता से मुक्त होने, तथा आत्मवान बनने का आदेश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जिस प्रकार चारों ओर जल से परिपूर्ण सरोवर के होने पर, एक छोटे कुएँ का कोई विशेष प्रयोजन नहीं रह जाता, उसी प्रकार आत्मज्ञानी ब्राह्मण के लिए, समस्त वेदों का भी उतना ही सीमित प्रयोजन रह जाता है। यहीं श्रीकृष्ण ने वह उपदेश भी दिया, जो कालांतर में कर्मयोग के मूल सिद्धांत के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ — तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए न तो कर्मफल को अपने कर्म का हेतु बनाओ, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो। हे धनञ्जय, आसक्ति को त्यागकर, तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव रखते हुए, योग में स्थित होकर ही अपने कर्तव्यों का पालन करो — इसी समत्व को योग कहा गया है। फल की इच्छा से किया गया कर्म, समत्व-बुद्धि से किए गए कर्म की तुलना में अत्यंत निम्नकोटि का होता है — अतः हे धनञ्जय, इस बुद्धि-योग की ही शरण ग्रहण करो; फल के लिए कर्म करने वाले अत्यंत दयनीय होते हैं। समत्व-बुद्धि से युक्त पुरुष, इसी जीवन में शुभ और अशुभ, दोनों प्रकार के कर्मों का परित्याग कर देता है — अतः तुम भी योग में प्रवृत्त हो जाओ; योग ही कर्मों में कुशलता है। समत्व-बुद्धि से युक्त ज्ञानीजन, कर्म से उत्पन्न फल का त्याग करके, तथा जन्म के बन्धन से मुक्त होकर, उस दुःखरहित परम पद को प्राप्त करते हैं। जब तुम्हारी बुद्धि मोह के इस दलदल को पार कर लेगी, तब तुम पूर्व में सुने हुए और आगे सुने जाने वाले शास्त्रीय विषयों के प्रति भी उदासीन हो जाओगे। और जब शास्त्रों के परस्पर विरोधाभासी वचनों से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि, आत्मा के ध्यान में स्थिर और अचल हो जाएगी, तभी तुम योग को प्राप्त करोगे। इसी बिन्दु पर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न किया — हे केशव, समाधि में स्थित, स्थिर-बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण होता है? ऐसा स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, तथा कैसे चलता है? इस पर श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत सुंदर, कालजयी उत्तर दिया — जब मनुष्य अपने मन में उठने वाली समस्त कामनाओं का पूर्णतः त्याग कर देता है, तथा आत्मा में ही, आत्मा के द्वारा ही सन्तुष्ट रहता है, तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, जो सुखों की प्राप्ति में निःस्पृह रहता है, तथा जिससे राग, भय और क्रोध सर्वथा विलुप्त हो चुके हैं, ऐसा मुनि ही स्थिर-बुद्धि कहा जाता है। जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, तथा शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त कर, न तो हर्षित होता है और न ही द्वेष करता है, उसकी बुद्धि सुप्रतिष्ठित मानी जाती है। और जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगों को चारों ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से पूर्णतः समेट लेता है, तभी उसकी बुद्धि स्थिर मानी जाती है। श्रीकृष्ण ने आगे एक अत्यंत सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी — इन्द्रिय-विषयों से मुख मोड़ लेने पर भी, इन्द्रिय-भोगों के प्रति एक सूक्ष्म आसक्ति (रस) मनुष्य के भीतर शेष रह जाती है, किंतु परम तत्त्व का साक्षात्कार होते ही, यह सूक्ष्म आसक्ति भी सर्वथा समाप्त हो जाती है। हे कुन्तीपुत्र, ये चंचल इन्द्रियाँ, प्रयत्नशील ज्ञानी पुरुष के मन को भी बलपूर्वक अपनी ओर खींच लेती हैं — अतः इन समस्त इन्द्रियों को वश में करके, मुझमें ही परायण होकर, युक्त होकर बैठना चाहिए; जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतः वश में हों, उसी की बुद्धि सुस्थिर मानी जाती है। इसी क्रम में उन्होंने पतन की उस भयावह श्रृंखला का भी वर्णन किया, जो प्रत्येक साधक के लिए एक सजग चेतावनी है — इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करते-करते, मनुष्य में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है; आसक्ति से कामना जन्म लेती है, तथा कामना में बाधा पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से सम्मोह (विवेक-भ्रम) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति का नाश होता है, स्मृति के नाश से बुद्धि का सर्वथा नाश हो जाता है, और बुद्धि के नाश होने पर, मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है — यही वह क्रमिक पतन है, जिससे हर साधक को सावधान रहना चाहिए। किंतु जो संयमी पुरुष, राग-द्वेष से रहित होकर, अपने वश में की गई इन्द्रियों के साथ इन्द्रिय-विषयों में विचरण करता है, वह अंततः प्रसन्नता (चित्त की निर्मलता) को प्राप्त होता है। उस प्रसन्नता में स्थित होते ही, उसके समस्त दुःखों का अंत हो जाता है, क्योंकि प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही सर्वथा स्थिर हो जाती है। जिसका मन वश में नहीं है, उसके लिए न तो सच्ची बुद्धि है, न ही ध्यान करने की क्षमता; और जिसके भीतर ध्यान नहीं है, उसे शान्ति प्राप्त नहीं होती — और शान्तिरहित मनुष्य को सुख आखिर कहाँ से प्राप्त हो सकता है? जिस प्रकार जल में चलती हुई नौका को प्रचंड वायु बहा ले जाती है, उसी प्रकार विचरण करती हुई इन्द्रियों में से जिस किसी एक के भी पीछे मन दौड़ पड़ता है, वही अकेली इन्द्रिय, मनुष्य की समस्त बुद्धि को हर लेती है। इसलिए, हे महाबाहु, जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, उनके विषयों से चारों ओर से पूर्णतः निग्रहीत हैं, उसी की बुद्धि सुस्थिर मानी जाती है। जो सम्पूर्ण प्राणियों के लिए रात्रि के समान है, उसमें संयमी पुरुष जागृत रहता है, और जिसमें सभी प्राणी जागृत रहते हैं, वह अन्तर्दृष्टि-सम्पन्न मुनि के लिए रात्रि के समान होता है। जिस प्रकार सभी दिशाओं से जल से परिपूर्ण होते रहने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर और अचल रहता है, उसी प्रकार जिस पुरुष में सभी कामनाएँ प्रवेश करती रहती हैं, फिर भी वह अविचलित रहता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है — न कि वह, जो उन्हीं कामनाओं की कामना करता रहता है। जो पुरुष समस्त कामनाओं का त्याग करके, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरण करता है, वही परम शान्ति को प्राप्त होता है। अंत में श्रीकृष्ण ने कहा — हे पार्थ, यही ब्राह्मी स्थिति कही गई है; इसे प्राप्त करने के पश्चात्, मनुष्य कभी पुनः मोहित नहीं होता। और यदि जीवन के अंतिम क्षण में भी, इसी स्थिति में स्थित रहा जाए, तो मनुष्य ब्रह्म-निर्वाण को — परम दिव्य तत्त्व में विलीन हो जाने के उस परम सुख को — प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार, अर्जुन के गहन शोक और विषाद के उत्तर में, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया यह प्रथम, तत्त्वपूर्ण उपदेश, आत्मा की अमरता, कर्तव्य-पालन की अनिवार्यता, तथा फलासक्ति-रहित कर्म के उस शाश्वत मार्ग की नींव रखता है, जिस पर चलकर मनुष्य इस संसार में रहते हुए भी, परम शान्ति को प्राप्त कर सकता है।