द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए इस गहन उपदेश को सुनकर, अर्जुन के मन में एक नई उलझन उत्पन्न हो गई। उन्होंने विनम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण से पूछा कि हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव, आप मुझे इस भीषण कर्म — इस युद्ध — में प्रवृत्त क्यों कर रहे हैं? आपके इन मिश्रित वचनों से मेरी बुद्धि मानो और भी अधिक भ्रमित हो उठी है। अतः मुझे वह एक निश्चित मार्ग बताइए, जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि हे निष्पाप अर्जुन, इस संसार में सृष्टि के आरम्भ से ही दो मार्ग बताए गए हैं — सांख्य-योगियों के लिए ज्ञान-योग का मार्ग, तथा कर्मयोगियों के लिए कर्म-योग का मार्ग। किंतु कोई भी मनुष्य केवल कर्मों को आरम्भ न करने मात्र से ही नैष्कर्म्य (कर्म-बन्धन से मुक्ति) को प्राप्त नहीं कर सकता, और न ही केवल संन्यास लेने मात्र से सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण, प्रत्येक प्राणी को विवशतापूर्वक कर्म में प्रवृत्त करते रहते हैं।
श्रीकृष्ण ने आगे एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया — जो व्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों को तो बलपूर्वक रोक लेता है, किंतु मन ही मन इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करता रहता है, ऐसा मोहग्रस्त व्यक्ति मिथ्याचारी (पाखंडी) कहलाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति मन के द्वारा इन्द्रियों को वश में करके, बिना किसी आसक्ति के, कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए हे अर्जुन, तुम अपने नियत कर्तव्य-कर्म का पालन करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है — कर्म के बिना तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी सम्भव नहीं होगा। यह सम्पूर्ण संसार कर्म के बन्धन में बँधा हुआ है, केवल यज्ञ के निमित्त किए गए कर्म को छोड़कर — अतः हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति को त्यागकर, इसी यज्ञ-भावना से अपने कर्तव्यों का पालन करो।
इसी सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने सृष्टि के आरम्भ की एक अत्यंत सुंदर कथा भी सुनाई। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में, प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ के साथ-साथ ही समस्त मानव-जाति की रचना की, और उनसे कहा — इस यज्ञ के द्वारा तुम सब उन्नति को प्राप्त करो, यही तुम्हारी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो। इसी यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं का पोषण करो, और वे देवता भी तुम्हारा पोषण करें — इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे का पोषण करते हुए, तुम सब परम कल्याण को प्राप्त होगे। यज्ञ से तृप्त हुए देवता, तुम्हें तुम्हारी अभीष्ट भोग-वस्तुएँ प्रदान करेंगे — किंतु जो व्यक्ति इन देवताओं से प्राप्त इन वस्तुओं का उपभोग, उन्हें कुछ अर्पित किए बिना ही करता है, वह वस्तुतः एक चोर के समान है। जो सज्जन व्यक्ति यज्ञ के अवशेष का ही भोजन करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं, किंतु जो दुष्ट व्यक्ति केवल अपने ही लिए भोजन पकाते हैं, वे वास्तव में पाप का ही भक्षण करते हैं।
श्रीकृष्ण ने इस सृष्टि-चक्र को और भी गहराई से समझाया — अन्न से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न की उत्पत्ति होती है, यज्ञ से वर्षा होती है, और यज्ञ स्वयं कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म की उत्पत्ति वेद (ब्रह्म) से जानो, तथा वेद अक्षर (परब्रह्म) से प्रकट होते हैं — इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म, यज्ञ में सदा प्रतिष्ठित रहता है। जो व्यक्ति इस प्रकार चलाए गए चक्र का अनुसरण नहीं करता, तथा पापपूर्ण जीवन जीते हुए केवल इन्द्रियों के भोग में ही रमा रहता है, हे पार्थ, ऐसा व्यक्ति व्यर्थ ही जीवन जीता है।
किंतु जो व्यक्ति केवल आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तथा आत्मा में ही पूर्णतः तृप्त है, उसके लिए फिर कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। ऐसे पुरुष का इस संसार में किए गए अथवा न किए गए किसी भी कर्म से कोई प्रयोजन नहीं रहता, तथा वह किसी भी प्राणी पर किसी भी उद्देश्य से आश्रित नहीं रहता। इसलिए, हे अर्जुन, बिना किसी आसक्ति के, निरन्तर अपने कर्तव्य-कर्म का पालन करते रहो, क्योंकि आसक्ति-रहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य ही परम पद को प्राप्त होता है। राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी कर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी — इसलिए तुम्हें भी लोक-कल्याण (लोकसंग्रह) की दृष्टि से कर्म करना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने इस लोकसंग्रह के सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य जन भी उसी का अनुसरण करते हैं — वह जो भी आदर्श स्थापित करता है, सम्पूर्ण संसार उसी का अनुगमन करने लगता है। उन्होंने स्वयं के उदाहरण से समझाया कि हे पार्थ, मुझे इन तीनों लोकों में ऐसा कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है, और न ही कोई ऐसी अप्राप्त वस्तु है, जिसे मुझे प्राप्त करना हो — फिर भी मैं निरन्तर कर्म में प्रवृत्त रहता हूँ। यदि मैं भी सतर्कतापूर्वक कर्म न करूँ, तो हे पार्थ, सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे। यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ, तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँ, मैं वर्ण-संकरता का कारण बन जाऊँ, तथा इन समस्त प्राणियों का विनाश कर बैठूँ।
इसलिए, जिस प्रकार अज्ञानी जन आसक्तिपूर्वक कर्म करते हैं, हे भारत, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष को भी कर्म करना चाहिए, किंतु आसक्ति-रहित होकर, तथा लोक-कल्याण की भावना से। ज्ञानी पुरुष को कर्म में आसक्त अज्ञानी जनों की बुद्धि को कभी विचलित नहीं करना चाहिए — इसके विपरीत, स्वयं सुसंयमित होकर सभी कर्मों का आचरण करते हुए, उसे औरों को भी उसी मार्ग पर प्रेरित करना चाहिए। श्रीकृष्ण ने यह गहन सत्य भी बताया कि समस्त कर्म वस्तुतः प्रकृति के गुणों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं — किंतु अहंकार से मोहित बुद्धि वाला व्यक्ति यह मान बैठता है कि मैं ही कर्ता हूँ। जो व्यक्ति गुण और कर्म के इस विभाजन के तत्त्व को भलीभाँति जानता है — यह समझते हुए कि गुण-रूपी इन्द्रियाँ, गुण-रूपी विषयों में ही विचरण कर रही हैं — वह इनमें आसक्त नहीं होता।
प्रकृति के गुणों से मोहित व्यक्ति, उन्हीं गुणों के कर्मों में आसक्त हो जाते हैं — किंतु पूर्ण ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति को, इन अल्पज्ञानी, मंदबुद्धि जनों की श्रद्धा को कभी विचलित नहीं करना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह भी आदेश दिया कि समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित करके, अध्यात्म-चित्त से युक्त होकर, कामना और ममता से रहित होकर, तथा मानसिक संताप से मुक्त होकर, तुम युद्ध करो। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक तथा दोष-दृष्टि से रहित होकर, मेरे इस उपदेश का निरन्तर अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। किंतु जो इसमें दोष निकालते हुए, मेरे इस उपदेश का पालन नहीं करते, उन्हें समस्त ज्ञान में मोहित, बुद्धिहीन तथा नष्टप्राय ही समझो।
श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि ज्ञानी पुरुष भी अपने ही स्वभाव (प्रकृति) के अनुरूप ही आचरण करता है — समस्त प्राणी अपनी-अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं, फिर बलपूर्वक निग्रह से क्या लाभ? प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में, राग और द्वेष पहले से ही व्यवस्थित रहते हैं — मनुष्य को इन दोनों के वश में कभी नहीं आना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही मनुष्य के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश भी दिया — अच्छी प्रकार आचरण किए गए दूसरे के धर्म की अपेक्षा, अपना धर्म — भले ही वह गुणरहित हो — कहीं अधिक श्रेष्ठ है; अपने ही धर्म का पालन करते हुए मृत्यु को प्राप्त होना भी कल्याणकारी है, जबकि दूसरे का धर्म अनेक भयों से युक्त होता है।
श्रीकृष्ण ने इस लोकसंग्रह के सिद्धांत को और भी अधिक व्यावहारिक ढंग से समझाया। उन्होंने कहा कि यदि कोई ज्ञानी पुरुष, स्वयं आसक्ति-रहित होकर भी, समाज के सामने आलस्य अथवा कर्महीनता का उदाहरण प्रस्तुत करे, तो सामान्य जन, जो अभी उतने विवेकी नहीं हैं, उसी का अनुसरण करते हुए अपने-अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएँगे, और इस प्रकार सम्पूर्ण समाज की व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी। इसलिए, चाहे मनुष्य कितना भी ज्ञानी अथवा आत्मतृप्त क्यों न हो जाए, उसे समाज और आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की दृष्टि से, अपने कर्तव्यों का पालन उतनी ही निष्ठा और अनुशासन के साथ करते रहना चाहिए, जितनी निष्ठा से एक सामान्य, अज्ञानी व्यक्ति करता है — केवल भीतर की आसक्ति और फल-कामना का त्याग करते हुए। इस प्रकार, बाहर से देखने पर ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का कर्म एक समान ही प्रतीत होगा, किंतु भीतर से, एक का मन आसक्ति और अहंकार से मुक्त होगा, जबकि दूसरे का मन उन्हीं में बँधा रहेगा।
इस पर अर्जुन ने एक अत्यंत स्वाभाविक प्रश्न पूछा — हे वार्ष्णेय, फिर मनुष्य, मानो किसी बाध्यता से प्रेरित होकर, न चाहते हुए भी आखिर किस कारण पाप की ओर प्रवृत्त हो जाता है? श्रीकृष्ण ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि यह रजोगुण से उत्पन्न काम (कामना) ही है, जो क्रोध का रूप धारण कर लेता है — यह सर्वभक्षी तथा महापापी है, इसे ही इस विषय में शत्रु जानो। जिस प्रकार धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण, तथा गर्भाशय-झिल्ली से भ्रूण ढका रहता है, उसी प्रकार यह कामना, ज्ञान को ढके रहती है। यह अग्नि के समान अतृप्त, तथा ज्ञानियों के इस नित्य शत्रु के रूप में स्थित काम, मनुष्य के ज्ञान को आवृत्त कर लेता है। इन्द्रियाँ, मन, तथा बुद्धि — इन्हें ही इस कामना का निवास-स्थान कहा गया है, और इन्हीं के माध्यम से यह कामना, देहधारी जीव के ज्ञान को मोहित करती है।
श्रीकृष्ण ने इस काम-रूपी शत्रु की भयावहता को और भी सजीव उदाहरणों से समझाया — जिस प्रकार एक छोटी-सी चिंगारी भी, यदि समय रहते न बुझाई जाए, तो सम्पूर्ण वन को भस्म कर सकती है, उसी प्रकार यह कामना, यदि आरम्भ में ही नियंत्रित न की जाए, तो मनुष्य के सम्पूर्ण विवेक, संयम तथा सद्गुणों को धीरे-धीरे भस्म कर देती है। यही कामना जब पूर्ण नहीं होती, तब क्रोध का रूप धारण कर लेती है, और क्रोध में अंधा हुआ मनुष्य, अपने ही हितैषियों को भी शत्रु समझने लगता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि साधक को अपनी साधना के आरम्भ में ही, इन्द्रिय-संयम को सर्वाधिक प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि एक बार यह कामना मन और बुद्धि पर अपना अधिकार जमा ले, तो फिर उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन हो जाता है।
इसलिए, हे भरतश्रेष्ठ, सबसे पहले अपनी इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान और विवेक का नाश करने वाले इस पापी काम को नष्ट कर डालो। इन्द्रियों को श्रेष्ठ कहा गया है, इन्द्रियों से भी मन श्रेष्ठ है, मन से भी बुद्धि श्रेष्ठ है, और जो बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, वह स्वयं आत्मा ही है। इस प्रकार बुद्धि से भी परे स्थित उस आत्मा को जानकर, तथा बुद्धि के द्वारा मन को संयमित करके, हे महाबाहु, इस दुर्जय काम-रूपी शत्रु का पूर्णतः नाश कर दो। इस उपदेश को समाप्त करते हुए, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह भी स्मरण कराया कि यह कर्मयोग का मार्ग कोई नवीन शिक्षा नहीं, अपितु सृष्टि के आरम्भ से ही ऋषि-मुनियों द्वारा अनुसरित एक शाश्वत मार्ग है — केवल इसे सही ढंग से समझना और आचरण में लाना ही कठिन प्रतीत होता है, क्योंकि मनुष्य का मन स्वभावतः फल की ओर ही आकृष्ट रहता है। उन्होंने अर्जुन को आश्वस्त किया कि यदि वह अपने कर्तव्य को यज्ञ-भावना से, बिना किसी स्वार्थ के, तथा समस्त प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से सम्पन्न करे, तो न केवल वह इस युद्ध-रूपी कर्तव्य से मुक्त होगा, अपितु उस परम शांति को भी प्राप्त करेगा, जिसकी खोज में वह इतना व्याकुल है। इस प्रकार, तृतीय अध्याय में श्रीकृष्ण, अर्जुन को कर्मयोग के इस गूढ़ रहस्य का बोध कराते हैं — कि सच्चा संन्यास कर्म के त्याग में नहीं, अपितु फल की आसक्ति के त्याग में निहित है, तथा निष्काम भाव से, लोक-कल्याण की भावना से किया गया कर्तव्य-पालन ही मनुष्य को परम कल्याण की ओर ले जाता है।
