तृतीय अध्याय के इस गूढ़ उपदेश के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक अत्यंत रहस्यमय, प्राचीन सत्य से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि यह अविनाशी योग मैंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को दिया था, विवस्वान ने इसे मनु को, तथा मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को प्रदान किया। इस प्रकार, राजर्षियों की परम्परा से यह योग निरन्तर प्रवाहित होता रहा — किंतु हे परन्तप, दीर्घ काल बीतने पर, यह श्रेष्ठ योग इस संसार में लुप्तप्राय हो गया। श्रीकृष्ण ने कहा कि आज मैं तुम्हें वही प्राचीन योग पुनः बता रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे भक्त भी हो और सखा भी — और यह एक परम रहस्य है।
यह सुनकर अर्जुन के मन में स्वाभाविक कौतूहल उत्पन्न हुआ, और उन्होंने पूछा कि हे केशव, आपका जन्म तो अभी हुआ है, जबकि विवस्वान का जन्म तो बहुत पहले हो चुका था — तो फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आपने ही आरम्भ में यह योग उन्हें सिखाया था? इस पर श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत गहन, कालजयी रहस्य प्रकट किया, जो आगे चलकर सम्पूर्ण भारतीय दर्शन का आधार-स्तम्भ बना — उन्होंने कहा कि हे अर्जुन, मेरे भी अनेक जन्म हो चुके हैं, और तुम्हारे भी — अंतर केवल इतना है कि मुझे वे सभी जन्म स्मरण हैं, जबकि तुम्हें उनका स्मरण नहीं है। यद्यपि मैं स्वभाव से अजन्मा और अविनाशी हूँ, तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी ही प्रकृति को अधीन करके, मैं अपनी ही योगमाया के द्वारा प्रकट होता हूँ। हे भरतवंशी, जब-जब धर्म की हानि होती है, और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को साकार रूप में प्रकट करता हूँ। साधु-पुरुषों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए, मैं युग-युग में जन्म लेता रहता हूँ।
इस अत्यंत रहस्यमय उपदेश को सुनकर, अर्जुन का मन एक क्षण के लिए विस्मय से भर उठा। यह पहली बार था, जब उनके प्रिय सखा और सारथी, जिनके साथ उन्होंने बचपन से लेकर अब तक असंख्य युद्ध और यात्राएँ की थीं, स्वयं को साक्षात् परमेश्वर के रूप में प्रकट कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने इस रहस्य को और भी स्पष्ट करते हुए समझाया कि मेरा यह जन्म तथा मेरे ये समस्त कर्म, दिव्य हैं — इस सत्य को जो पुरुष यथार्थ रूप से समझ लेता है, वह कर्मों के सामान्य बन्धन से सर्वथा परे चला जाता है, क्योंकि वह यह जान लेता है कि परमात्मा स्वयं इच्छापूर्वक, अपनी ही योगमाया से, धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य-रूप धारण करता है, न कि किसी पूर्वजन्म के कर्म-बन्धन के कारण। जिस प्रकार युग-युग में अनेक अवतार हुए हैं — कभी धर्म की रक्षा के लिए, कभी असुरों के संहार के लिए — उसी प्रकार यह अवतरण भी उसी सनातन नियम का पालन है, जो सृष्टि के आरम्भ से चला आ रहा है।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि जो व्यक्ति मेरे इस दिव्य जन्म और दिव्य कर्म के तत्त्व को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के पश्चात् पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मुझे ही प्राप्त होता है, हे अर्जुन। आसक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त, मुझमें ही तल्लीन, मेरी शरण में आए हुए, तथा ज्ञान-रूपी तप से पवित्र हुए अनेक भक्तों ने, इसी प्रकार मेरे स्वरूप को प्राप्त किया है। जो भक्त जिस प्रकार भी मेरी शरण में आते हैं, मैं भी उन्हें उसी प्रकार स्वीकार करता हूँ — सभी मनुष्य, हर प्रकार से, अंततः मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं, हे पार्थ।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उस प्रसिद्ध चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था का भी उल्लेख किया, जिसे उन्होंने गुण और कर्म के विभाजन के आधार पर स्वयं रचा था — किंतु यद्यपि मैं ही उसका कर्ता हूँ, फिर भी मुझे अकर्ता तथा अविनाशी ही जानो। कर्म मुझे कभी लिप्त नहीं करते, न ही मुझे कर्मफल की कोई इच्छा है — जो मनुष्य मुझे इस प्रकार तत्त्वतः जान लेता है, वह भी कर्मों से कभी बँधता नहीं। इसी ज्ञान को जानकर, प्राचीन काल के मुमुक्षुओं (मोक्ष के इच्छुक साधकों) ने भी कर्म किया था — अतः तुम भी वैसे ही कर्म करो, जैसे उन प्राचीन पुरुषों ने पूर्वकाल में किया था।
यहीं श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत सूक्ष्म, गहन प्रश्न भी उठाया, जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं — कर्म क्या है, और अकर्म क्या है? मैं तुम्हें वह कर्म-तत्त्व समझाऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे। कर्म की गति अत्यंत रहस्यमयी है — इसलिए कर्म, विकर्म (निषिद्ध कर्म), तथा अकर्म — इन तीनों के तत्त्व को भलीभाँति समझना आवश्यक है। जो व्यक्ति कर्म में अकर्म को, तथा अकर्म में कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है — वह योगी कहलाता है, भले ही वह समस्त कर्मों को सम्पन्न कर रहा हो। जिस व्यक्ति के समस्त कर्म संकल्प और कामना से रहित हैं, तथा जिसके कर्म ज्ञान-रूपी अग्नि में भस्म हो चुके हैं, उसे ही ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।
फल की आसक्ति को त्यागकर, सदा सन्तुष्ट, तथा किसी पर भी आश्रित न रहने वाला ऐसा व्यक्ति, भलीभाँति कर्म में प्रवृत्त रहते हुए भी, वास्तव में कुछ भी नहीं करता। आशारहित, मन और इन्द्रियों को संयमित रखते हुए, समस्त स्वामित्व-भाव को त्यागकर, केवल शरीर से ही कर्म करने वाला वह व्यक्ति, कभी पाप का भागी नहीं बनता। जो भी अनायास प्राप्त हो, उसी में संतुष्ट रहने वाला, द्वंद्वों से ऊपर उठा हुआ, ईर्ष्या-रहित, तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव रखने वाला व्यक्ति, कर्म करते हुए भी उसमें कभी बँधता नहीं। आसक्ति-रहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित बुद्धि वाले, तथा केवल यज्ञ के निमित्त कर्म करने वाले व्यक्ति के समस्त कर्म, सर्वथा विलीन हो जाते हैं।
यहीं श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश भी दिया, जिसे ब्रह्मार्पणम् के नाम से जाना जाता है — अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्म-रूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही यह आहुति दी जा रही है — जो व्यक्ति समस्त कर्मों में इस प्रकार ब्रह्म को ही देखता है, वह अंततः ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। उन्होंने आगे विभिन्न प्रकार के यज्ञों का भी वर्णन किया — कुछ योगीजन केवल देवताओं की उपासना के रूप में यज्ञ करते हैं, तो कुछ यज्ञ-रूप को ही ब्रह्म-रूपी अग्नि में आहुत कर देते हैं। कुछ साधक अपनी श्रवणादि इन्द्रियों को संयम की अग्नि में हवन करते हैं, तो कुछ शब्दादि विषयों को इन्द्रिय-रूपी अग्नियों में। अन्य कुछ साधक, ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम-योग की अग्नि में, अपनी समस्त इन्द्रियों तथा प्राणों की क्रियाओं को हवन कर देते हैं।
इसी प्रकार, कुछ साधक द्रव्य का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का, तथा कठोर व्रत और तीक्ष्ण बुद्धि वाले कुछ साधक, स्वाध्याय और ज्ञान का ही यज्ञ करते हैं। कुछ योगीजन अपान में प्राण को, और प्राण में अपान को हवन करते हुए, प्राणायाम में तल्लीन रहते हैं, तथा कुछ, आहार को नियंत्रित करके, अपने प्राणों को ही प्राणों में हवन कर देते हैं — ये सभी यज्ञ के मर्म को जानने वाले साधक हैं, जिनके पाप यज्ञ के द्वारा ही नष्ट हो जाते हैं। यज्ञ के अमृत-तुल्य अवशेष का भोग करने वाले साधक, सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं — जबकि यज्ञ न करने वाले के लिए तो यह लोक भी सुलभ नहीं, फिर परलोक की तो बात ही क्या, हे कुरुश्रेष्ठ। इस प्रकार अनेकानेक यज्ञ, वेद-वाणी में विस्तारपूर्वक वर्णित किए गए हैं — इन सबको कर्म से उत्पन्न जानो, और यह जानकर तुम संसार-बन्धन से मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार यज्ञ के इतने विविध रूपों का वर्णन करते हुए, श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि चाहे कोई साधक द्रव्य अर्पित करे, चाहे कठोर तप करे, चाहे प्राणायाम में लीन रहे, अथवा केवल स्वाध्याय और शास्त्र-चिन्तन में निरत रहे — इन सबका मूल उद्देश्य एक ही है, अर्थात् अपने मन और इन्द्रियों को संयमित करके, स्वयं को उस परम तत्त्व के निकट ले जाना। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न मार्गों से चलने वाली नदियाँ, अंततः एक ही समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, उसी प्रकार ये समस्त यज्ञ-मार्ग भी, भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हुए भी, अंततः उसी एक परम ज्ञान की ओर ही ले जाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने आगे यह भी कहा कि साधक को यह देखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए कि दूसरों का मार्ग उसके अपने मार्ग से भिन्न है — प्रत्येक साधक को अपने स्वभाव और अधिकार के अनुरूप, श्रद्धापूर्वक अपने ही यज्ञ-मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलते रहना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने यहाँ वह गहन तुलना भी की, जो इस अध्याय का सर्वोच्च शिखर मानी जाती है — द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा, ज्ञान-यज्ञ कहीं श्रेष्ठ है, हे परन्तप — क्योंकि समस्त कर्म, बिना किसी अपवाद के, अंततः ज्ञान में ही पूर्ण होते हैं। उन्होंने अर्जुन को उपदेश दिया कि उस ज्ञान को भलीभाँति समझने के लिए, विनम्र भाव से गुरुजनों के समीप जाओ, प्रश्न पूछो, तथा उनकी सेवा करो — तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे। उस ज्ञान को प्राप्त करने के पश्चात्, हे पाण्डव, तुम पुनः इस प्रकार मोहित नहीं होगे — इस ज्ञान से तुम समस्त प्राणियों को पहले अपनी ही आत्मा में, और फिर मुझमें देखोगे। यदि तुम समस्त पापियों में भी सबसे बड़े पापी क्यों न हो, तो भी तुम इस ज्ञान-रूपी नौका के द्वारा, समस्त पापों के सागर को पार कर जाओगे। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि, लकड़ी को जलाकर भस्म कर देती है, हे अर्जुन, उसी प्रकार ज्ञान-रूपी अग्नि, समस्त कर्मों को भस्म कर देती है। इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला अन्य कुछ भी नहीं है — योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति, स्वयं ही समय के साथ इसे अपने भीतर प्राप्त कर लेता है।
श्रद्धावान, तत्पर, तथा संयमित इन्द्रियों वाला व्यक्ति ही उस ज्ञान को प्राप्त करता है, और ज्ञान प्राप्त करते ही, वह शीघ्र परम शांति को प्राप्त होता है। किंतु जो अज्ञानी है, श्रद्धाहीन है, तथा सन्देह करने वाले स्वभाव का है, वह नष्ट हो जाता है — सन्देहग्रस्त आत्मा के लिए न तो यह लोक है, न परलोक, और न ही कोई सुख। योग के द्वारा जिसने कर्म का त्याग किया है, जिसका सन्देह ज्ञान से नष्ट हो चुका है, तथा जो आत्मस्थ है, हे धनञ्जय, उसे कर्म कभी बाँधते नहीं। इसलिए, हृदय में स्थित इस अज्ञान-जनित सन्देह को ज्ञान-रूपी तलवार से काटकर, योग में स्थित होकर, उठ खड़े हो जाओ, हे भारत!
श्रीकृष्ण ने इस उपदेश के अंत में अर्जुन को यह भी स्मरण कराया कि ज्ञान की यह पवित्र अग्नि, किसी बाहरी कर्मकाण्ड से नहीं, अपितु गुरु की सेवा, निरन्तर जिज्ञासा, तथा श्रद्धापूर्ण अभ्यास से ही प्रज्वलित होती है — यह कोई ऐसा रहस्य नहीं, जिसे बलपूर्वक अथवा शीघ्रता से प्राप्त किया जा सके, अपितु यह धैर्य और विनम्रता से, वर्षों की साधना से ही फलीभूत होता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिस प्रकार सूर्योदय होते ही सम्पूर्ण रात्रि का अंधकार क्षणभर में तिरोहित हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञान का यह प्रकाश प्राप्त होते ही, जन्म-जन्मांतर से संचित समस्त सन्देह और मोह भी क्षणभर में विलीन हो जाते हैं। इसीलिए उन्होंने अर्जुन को पुनः प्रेरित किया कि सन्देह और भय को त्यागकर, दृढ़ श्रद्धा के साथ इस ज्ञान-मार्ग पर अग्रसर हो, क्योंकि यही मार्ग उसे न केवल इस युद्ध के कर्तव्य से, अपितु समस्त संसार-बन्धन से भी सदा के लिए मुक्त कर देगा।
इस प्रकार, चतुर्थ अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने दिव्य अवतार-रहस्य का बोध कराते हुए, कर्म, अकर्म तथा विकर्म के गूढ़ भेद को स्पष्ट करते हैं, नाना प्रकार के यज्ञों का वर्णन करते हुए यह सिद्ध करते हैं कि समस्त कर्म अंततः ज्ञान में ही समाहित हो जाते हैं, तथा इस बात पर बल देते हैं कि ज्ञान की वह पवित्र अग्नि ही, मनुष्य को उसके समस्त संचित कर्मों से सर्वथा मुक्त कर सकती है।
