अध्याय ५

कर्मसंन्यास योग

चतुर्थ अध्याय में ज्ञान, कर्म तथा संन्यास के इस गहन विवेचन को सुनकर, अर्जुन के मन में एक नई दुविधा उत्पन्न हो गई। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि हे कृष्ण, आप कभी कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं, तो कभी कर्मयोग की — इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से श्रेयस्कर हो, वही मुझे स्पष्टतः बताइए। वस्तुतः अर्जुन का यह प्रश्न पूर्णतः स्वाभाविक था, क्योंकि पूर्व के अध्यायों में श्रीकृष्ण ने कभी कर्म-त्याग की महिमा गाई थी, तो कभी निष्काम कर्म के महत्व को समझाया था — इस कारण अर्जुन के मन में यह भ्रम उत्पन्न हो गया था कि कदाचित् ये दोनों परस्पर विरोधी मार्ग हैं, तथा उसे इनमें से किसी एक को ही चुनना होगा। उनकी यह जिज्ञासा केवल बौद्धिक कुतूहल नहीं थी, अपितु एक व्यावहारिक दुविधा भी थी — क्योंकि युद्धभूमि में खड़े एक क्षत्रिय के लिए, यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, अपितु अत्यंत तात्कालिक और जीवन-मरण का प्रश्न बन गया था। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि संन्यास और कर्मयोग, दोनों ही मार्ग परम कल्याण की ओर ले जाते हैं — किंतु इन दोनों में से, कर्मों के संन्यास की अपेक्षा, कर्मयोग ही श्रेष्ठ माना जाता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति न तो किसी से द्वेष करता है, और न ही किसी वस्तु की कामना करता है, उसे ही नित्य संन्यासी जानना चाहिए — क्योंकि हे महाबाहु, द्वंद्वों से रहित ऐसा व्यक्ति ही सहजता से बन्धन से मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि अज्ञानीजन ही सांख्य (ज्ञान-मार्ग) और योग (कर्म-मार्ग) को परस्पर भिन्न मानते हैं, ज्ञानीजन नहीं — क्योंकि जो व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक में भी भलीभाँति स्थित हो जाता है, वह दोनों के ही फल को प्राप्त कर लेता है। जिस परम पद को सांख्ययोगी ज्ञान के द्वारा प्राप्त करते हैं, उसी पद को कर्मयोगी भी कर्म के द्वारा प्राप्त कर लेते हैं — जो व्यक्ति सांख्य और योग को एक ही देखता है, वही वास्तव में सम्यक् दृष्टि रखता है। किंतु श्रीकृष्ण ने यह चेतावनी भी दी कि हे महाबाहु, कर्मयोग के बिना, केवल संन्यास को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है — जबकि योग में निपुण मुनि, शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। योग से युक्त, विशुद्ध अन्तःकरण वाला, मन और इन्द्रियों को जीतने वाला, तथा समस्त प्राणियों की आत्मा को अपनी ही आत्मा के समान देखने वाला व्यक्ति, कर्म करते हुए भी, उससे कभी लिप्त नहीं होता। ऐसा तत्त्ववेत्ता योगी यह भलीभाँति जानता है कि देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, श्वास लेते हुए, तथा बोलते हुए भी, वास्तव में मैं कुछ भी नहीं करता — वह यह समझता है कि इन्द्रियाँ ही अपने-अपने विषयों में विचरण कर रही हैं, आत्मा तो सर्वथा असंग है। श्रीकृष्ण ने इस तत्त्व को और भी स्पष्ट करने के लिए कहा कि जिस प्रकार एक अनुभवी सारथी, रथ को चलाते हुए भी यह भलीभाँति जानता है कि रथ की गति वास्तव में घोड़ों के परिश्रम से हो रही है, न कि उसके अपने शरीर के बल से — उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी, शरीर और इन्द्रियों के माध्यम से समस्त क्रियाएँ सम्पन्न होते देखकर भी, यह भलीभाँति जानता है कि यह सब प्रकृति के गुणों का ही खेल है, आत्मा तो सदा असंग, साक्षी-मात्र बनी रहती है। यही भेद-ज्ञान, कर्मयोगी को साधारण कर्मी से पृथक करता है — बाहर से देखने पर दोनों का कर्म समान प्रतीत हो सकता है, किंतु भीतर से, एक का मन कर्तृत्व के अहंकार से सर्वथा मुक्त होता है, जबकि दूसरा उसी में बँधा रहता है। श्रीकृष्ण ने आगे एक अत्यंत सुंदर उपमा दी — जो व्यक्ति आसक्ति को त्यागकर, अपने समस्त कर्मों को ब्रह्म को अर्पित करके कार्य करता है, वह उसी प्रकार पाप से अछूता रहता है, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है। योगीजन, आसक्ति को त्यागकर, केवल शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों के द्वारा ही कर्म करते हैं, और वह भी केवल अन्तःकरण की शुद्धि के निमित्त। योग-युक्त व्यक्ति, कर्मफल का त्याग करके, उस शाश्वत शांति को प्राप्त होता है, जबकि अयुक्त व्यक्ति, कामना से प्रेरित होकर, फल में आसक्त रहकर, सदैव बन्धन में ही पड़ा रहता है। इसी क्रम में श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत गहन दार्शनिक सत्य भी उद्घाटित किया — आत्मसंयमी पुरुष, मन से समस्त कर्मों का सर्वथा त्याग करके, नौ द्वारों वाले इस शरीर-रूपी नगर में, न तो स्वयं कुछ करते हुए, और न ही कुछ कराते हुए, सुखपूर्वक निवास करता है। यह परमात्मा न तो किसी के कर्तृत्व की रचना करता है, न कर्मों की, और न ही कर्म-फल के संयोग की — यह तो प्रकृति ही है, जो सब कुछ करती है। सर्वव्यापी परमेश्वर, न तो किसी के पाप को, और न ही किसी के पुण्य को ग्रहण करता है — अज्ञान के द्वारा ही ज्ञान आवृत्त हो जाता है, और इसी कारण समस्त प्राणी मोहित होते हैं। किंतु जिनका यह आत्म-अज्ञान, ज्ञान के द्वारा नष्ट हो चुका है, उनके लिए वह ज्ञान, सूर्य के समान, उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है। श्रीकृष्ण ने आगे उन साधकों का भी वर्णन किया, जिनका मन और बुद्धि उसी परम तत्त्व में स्थिर हो चुकी है, जो सर्वथा उसी में तल्लीन तथा समर्पित हैं — ऐसे साधक, ज्ञान के द्वारा अपने समस्त पापों को धोकर, उस परम पद को प्राप्त होते हैं, जहाँ से पुनः लौटना नहीं पड़ता। तत्त्वज्ञानी पुरुष, विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण को, गाय को, हाथी को, तथा यहाँ तक कि कुत्ते और चांडाल को भी, समान दृष्टि से ही देखते हैं। जिसका मन इस प्रकार समत्व में स्थिर हो चुका है, उसने इसी जीवन में जन्म-मृत्यु के चक्र को जीत लिया है — क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और समान है, इसलिए ऐसे व्यक्ति ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित रहते हैं। प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित नहीं होना चाहिए, और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होना चाहिए — स्थिर बुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष, सदा ब्रह्म में ही स्थित रहता है। श्रीकृष्ण ने इस समदर्शन की शिक्षा को अत्यंत साहसपूर्वक प्रस्तुत किया, क्योंकि उस युग के समाज में वर्ण और जाति के भेद अत्यंत दृढ़ता से माने जाते थे, फिर भी उन्होंने स्पष्ट कहा कि सच्चा ज्ञानी इन बाहरी भेदों से कभी प्रभावित नहीं होता। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश राजमहल पर भी उतना ही पड़ता है, जितना किसी निर्धन की कुटिया पर, उसी प्रकार आत्मा भी, ब्राह्मण और चांडाल, दोनों में ही समान रूप से विद्यमान रहती है — केवल शरीर और परिस्थितियाँ भिन्न प्रतीत होती हैं, भीतर का चैतन्य-तत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसी समत्व-दृष्टि को प्राप्त कर लेना ही सच्चे ज्ञान की कसौटी है, न कि केवल शास्त्रों का पांडित्य। जो व्यक्ति बाह्य विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं होता, तथा आत्मा में ही सुख को प्राप्त करता है, ऐसा साधक, ब्रह्म के साथ योग-युक्त होकर, अक्षय सुख को प्राप्त करता है — क्योंकि इन्द्रिय-विषयों के संयोग से उत्पन्न भोग, वस्तुतः दुःख के ही कारण हैं, हे कुन्तीपुत्र; उनका आदि और अन्त दोनों ही निश्चित हैं, इसलिए ज्ञानी पुरुष उनमें कभी रमण नहीं करते। जो व्यक्ति शरीर त्यागने से पूर्व ही, इसी जीवन में, काम और क्रोध से उत्पन्न इस वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही सच्चा योगी है, वही सच्चा सुखी पुरुष है। श्रीकृष्ण ने इस अध्याय के समापन की ओर बढ़ते हुए, उस साधक की अत्यंत मनोहर छवि प्रस्तुत की, जिसे उन्होंने ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होने वाला कहा — जो पुरुष अपने भीतर ही सुख पाता है, भीतर ही रमण करता है, तथा जिसका ज्ञान-प्रकाश भी भीतर ही स्थित है, वह योगी, ब्रह्म से एकत्व को प्राप्त होकर, ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है। जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो चुके हैं, जिनके संशय दूर हो चुके हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को वश में कर लिया है, तथा जो समस्त प्राणियों के कल्याण में ही रमण करते हैं, वे ऋषि भी ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होते हैं। काम और क्रोध से मुक्त, संयमित चित्त वाले, तथा आत्मज्ञानी तपस्वियों के लिए, ब्रह्म-निर्वाण सदैव उनके चारों ओर, अत्यंत निकट ही विद्यमान रहता है। श्रीकृष्ण ने यह भी जोड़ा कि जिस प्रकार समुद्र में अनेक तरंगें उठती और मिटती रहती हैं, फिर भी समुद्र का जल अपने मूल स्वरूप में अपरिवर्तित रहता है, उसी प्रकार जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, तथा मान-अपमान की तरंगें उठती-गिरती रहती हैं, किंतु आत्म-स्वरूप में स्थित साधक का चित्त, इन सबसे अप्रभावित रहता है। यही स्थिरता, बाहरी परिस्थितियों से नहीं, अपितु भीतर के आत्म-बोध से ही प्राप्त होती है — और एक बार यह बोध दृढ़ हो जाए, तो संसार के कोई भी उतार-चढ़ाव, साधक की आन्तरिक शांति को भंग नहीं कर सकते। इसी बिन्दु पर श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत व्यावहारिक चेतावनी भी दी, जो साधारण गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी किसी संन्यासी के लिए — उन्होंने कहा कि इन्द्रिय-सुख, चाहे वे कितने भी आकर्षक क्यों न प्रतीत हों, अंततः स्पर्श-जन्य ही हैं, अर्थात् वे इन्द्रिय और विषय के संयोग पर ही निर्भर हैं, इसलिए उनका स्वभाव ही क्षणभंगुर है — जो वस्तु आज सुख देती प्रतीत होती है, वही आगे चलकर दुःख का कारण भी बन सकती है। इसके विपरीत, आत्मा से उत्पन्न सुख, किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं होता, इसलिए वह शाश्वत और अक्षय रहता है। इसीलिए श्रीकृष्ण बार-बार इस भेद पर बल देते हैं — बाहरी सुख की खोज में भटकने के बजाय, मनुष्य को अपने भीतर स्थित उस अक्षय आनन्द को पहचानना चाहिए, जो किसी भी परिस्थिति में कभी क्षीण नहीं होता। अंत में श्रीकृष्ण ने उस साधना-विधि का भी संक्षिप्त उल्लेख किया, जो ध्यान-योग की ओर अग्रसर होने वालों के लिए सहायक है — बाह्य विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करके, नासिका के भीतर विचरण करने वाले प्राण और अपान को सम रखते हुए, तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके, जो मोक्ष-परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा मुक्त हो जाता है, वह सदा के लिए मुक्त ही है। और अंततः, मुझे ही समस्त यज्ञों और तपों का भोक्ता जानकर, समस्त लोकों का महान ईश्वर तथा समस्त प्राणियों का सुहृद जानकर, ऐसा साधक परम शांति को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ने इस उपदेश के समापन पर अर्जुन को यह भी स्मरण कराया कि यह मार्ग किसी एक विशेष वर्ग अथवा आश्रम के लिए सीमित नहीं है — चाहे कोई राजा हो अथवा प्रजा, चाहे कोई गृहस्थ हो अथवा वनवासी तपस्वी, प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, इसी समत्व-दृष्टि और निर्लिप्त भाव को अपने भीतर विकसित कर सकता है। उन्होंने कहा कि यह कोई ऐसा मार्ग नहीं है, जिसके लिए संसार को त्यागकर वन में जाना आवश्यक हो — अपितु यह तो मन की एक ऐसी अवस्था है, जिसे मनुष्य अपने प्रतिदिन के कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, धैर्यपूर्वक अभ्यास से प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार, पंचम अध्याय में श्रीकृष्ण यह सिद्ध करते हैं कि सांख्य और योग वस्तुतः दो भिन्न मार्ग नहीं, अपितु एक ही सत्य के दो द्वार हैं — तथा कमल-पत्र के समान निर्लिप्त रहकर किया गया कर्म, मनुष्य को उसी परम शांति की ओर ले जाता है, जिसे ज्ञानीजन ब्रह्म-निर्वाण कहते हैं।