पंचम अध्याय में कर्मसंन्यास के इस गूढ़ विवेचन के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उस ध्यान-योग की ओर उन्मुख किया, जिसे आत्मसंयम योग के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति कर्मफल पर निर्भर हुए बिना ही अपने कर्तव्य-कर्म का पालन करता है, वही सच्चा संन्यासी है, वही सच्चा योगी है — न कि केवल यज्ञ की अग्नि त्याग देने वाला, अथवा समस्त कर्मों को छोड़ बैठने वाला व्यक्ति। हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहा जाता है, उसे ही योग भी जानो — क्योंकि संकल्प का त्याग किए बिना, कोई भी व्यक्ति कभी योगी नहीं बन सकता।
श्रीकृष्ण ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि योग की सीढ़ी पर चढ़ने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए कर्म ही साधन कहा गया है, जबकि योग में पहले से आरूढ़ हो चुके व्यक्ति के लिए, शांति (चित्त की स्थिरता) ही साधन मानी जाती है। जब मनुष्य इन्द्रिय-विषयों में तथा कर्मों में आसक्त नहीं रहता, तथा समस्त संकल्पों का त्याग कर देता है, तभी वह योग में आरूढ़ कहलाता है। उन्होंने वह अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश भी दिया कि मनुष्य को अपने ही द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को कभी अधोगति में नहीं ले जाना चाहिए — क्योंकि आत्मा ही आत्मा की मित्र है, और आत्मा ही आत्मा की शत्रु भी। जिसने अपने मन को अपने ही वश में कर लिया है, उसके लिए आत्मा मित्र के समान है, किंतु जिसका मन अवश (अनियंत्रित) है, उसके लिए वही आत्मा, शत्रु के समान शत्रुता का व्यवहार करती है।
जिसने अपने मन को जीत लिया है, तथा जो शांत हो चुका है, ऐसे व्यक्ति की आत्मा, शीत-उष्ण, सुख-दुःख, तथा मान-अपमान में भी सदा परमात्मा में ही स्थिर रहती है। जिस योगी का चित्त ज्ञान और अनुभव से पूर्णतः तृप्त है, जो अविचल है, जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतः वश में हैं, तथा जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर, और स्वर्ण — सब कुछ समान है, वही योग-युक्त कहलाता है। जो व्यक्ति सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, साधु तथा पापी — सभी के प्रति समान भाव रखता है, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने ध्यान-योग की वह व्यावहारिक, विस्तृत विधि भी बताई, जो आज भी संसार भर में साधकों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है। उन्होंने कहा कि योगी को एकान्त स्थान में, अकेले, मन और शरीर को संयमित करके, आशा और स्वामित्व-भाव से रहित होकर, निरन्तर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। एक स्वच्छ स्थान में, न अधिक ऊँचा और न अधिक नीचा, कुशा, मृगचर्म तथा वस्त्र को क्रमशः बिछाकर, अपने लिए एक स्थिर आसन स्थापित करना चाहिए। वहाँ बैठकर, मन को एकाग्र करके, मन और इन्द्रियों की गतिविधियों को संयमित करके, आत्म-शुद्धि के निमित्त योग का अभ्यास करना चाहिए। शरीर, सिर तथा गर्दन को सीधा और स्थिर रखते हुए, अपनी ही नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि स्थिर करके, इधर-उधर न देखते हुए।
श्रीकृष्ण ने इस आसन-विधि का वर्णन इतनी सूक्ष्मता से किया, मानो वे स्वयं अर्जुन के सम्मुख बैठकर उसका प्रत्यक्ष प्रदर्शन कर रहे हों — उन्होंने बताया कि आसन ऐसा होना चाहिए, जिस पर बैठकर शरीर लम्बे समय तक बिना किसी कष्ट के स्थिर रह सके, क्योंकि यदि शरीर बार-बार असुविधा के कारण हिलता-डुलता रहे, तो मन कभी भी गहन एकाग्रता को प्राप्त नहीं कर सकता। इसी कारण उन्होंने वस्त्र, मृगचर्म तथा कुशा को क्रमशः बिछाने का निर्देश दिया, ताकि पृथ्वी की नमी और शीतलता, साधक की एकाग्रता में बाधा न बने। शरीर के अंग-प्रत्यंग को शिथिल किंतु सन्तुलित रखते हुए, रीढ़ को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए, क्योंकि इसी सीधी मुद्रा में, प्राण-शक्ति का प्रवाह बिना किसी अवरोध के, सहजता से ऊपर की ओर प्रवाहित हो पाता है।
शांत चित्त, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित, मन को संयमित करके, मुझमें ही चित्त लगाकर, तथा मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, योगी को इस प्रकार बैठना चाहिए। इस प्रकार निरन्तर अपने मन को अनुशासित करते हुए, संयमित-चित्त योगी, उस शांति को प्राप्त करता है, जो अंततः मुझमें ही परिणत होती है, तथा जो निर्वाण की चरम अवस्था है। श्रीकृष्ण ने यह भी सचेत किया कि यह योग न तो अत्यधिक भोजन करने वाले के लिए है, और न ही सर्वथा भोजन त्यागने वाले के लिए; न अत्यधिक सोने वाले के लिए, और न ही सदा जागते रहने वाले के लिए। भोजन और विहार में संयम रखने वाला, कर्मों में यथोचित परिश्रम करने वाला, तथा नींद और जागरण में भी संतुलन रखने वाला व्यक्ति ही, दुःखों का नाश करने वाले इस योग को प्राप्त करता है।
जब भलीभाँति संयमित मन, केवल आत्मा में ही स्थिर हो जाता है, तथा समस्त कामनाओं से रहित हो जाता है, तभी वह व्यक्ति योग-युक्त कहा जाता है। जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक कभी नहीं कँपकँपाता, यही पारम्परिक उपमा उस योगी के संयमित मन का वर्णन करने के लिए दी जाती है, जो आत्म-योग का अभ्यास कर रहा हो। वह अवस्था, जिसमें योग-अभ्यास से संयमित मन की गतिविधि सर्वथा शांत हो जाती है, तथा जिसमें साधक, आत्मा के द्वारा ही आत्मा को देखते हुए, आत्मा में ही सन्तुष्ट हो जाता है — वह अवस्था, जिसमें मनुष्य उस असीम आनन्द का अनुभव करता है, जो केवल शुद्ध बुद्धि द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है, तथा जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है — इसी में स्थित होकर, मनुष्य कभी उस सत्य से विचलित नहीं होता। इसे पाकर, मनुष्य किसी अन्य लाभ को इससे बड़ा नहीं मानता, तथा इसमें स्थित होकर, वह गहनतम दुःख से भी विचलित नहीं होता। इसी अवस्था को योग जानना चाहिए, जो दुःख के संयोग से सर्वथा मुक्ति है — इस योग का अभ्यास, दृढ़ निश्चय और अखिन्न (अनिराश) मन के साथ करना चाहिए।
संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं का बिना किसी अपवाद के त्याग करते हुए, तथा मन के द्वारा ही इन्द्रियों के समूह को चारों ओर से संयमित करते हुए, धीरे-धीरे, दृढ़ बुद्धि के सहारे शांति को प्राप्त करना चाहिए, तथा मन को आत्मा में स्थिर करके, अन्य किसी वस्तु का चिन्तन नहीं करना चाहिए। यह चंचल और अस्थिर मन, जिस-जिस कारण से भी भटकता है, उस-उस कारण से उसे रोककर, पुनः आत्मा के वश में लाना चाहिए। जिस योगी का मन पूर्णतः शांत हो चुका है, जिसकी रज़ोगुण-जनित उत्तेजना शांत हो चुकी है, जो निष्पाप है, तथा जो ब्रह्म के साथ एकत्व को प्राप्त हो चुका है, उसे ही परम सुख प्राप्त होता है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने वह गहन समदर्शन भी वर्णित किया, जो योग की चरम परिणति मानी जाती है — योग-युक्त पुरुष, जो सर्वत्र समान दृष्टि रखता है, वह आत्मा को समस्त प्राणियों में, तथा समस्त प्राणियों को आत्मा में स्थित देखता है। जो व्यक्ति मुझे सर्वत्र देखता है, तथा सब कुछ मुझमें ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता, और न ही वह मेरे लिए कभी अदृश्य होता है।
अर्जुन, जो अभी तक श्रीकृष्ण के इन उपदेशों को अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनते आए थे, इस बिन्दु पर आकर स्वयं को असमंजस में पाने लगे। एक महान धनुर्धर और युद्ध-कौशल में निपुण योद्धा होने के नाते, उन्हें बाह्य शत्रुओं से युद्ध करने का भलीभाँति अभ्यास था, किंतु अपने ही मन को, जो कि सबसे बड़ा और सूक्ष्म शत्रु प्रतीत हो रहा था, वश में करना — यह उन्हें एक सर्वथा भिन्न, कहीं अधिक दुष्कर चुनौती जान पड़ी। इसी उधेड़बुन में, इस गूढ़ उपदेश को सुनने के पश्चात्, अर्जुन ने एक अत्यंत स्वाभाविक शंका प्रकट की — हे मधुसूदन, आपने जिस समत्व-युक्त योग का वर्णन किया, मुझे मन की चंचलता के कारण, इसकी स्थिरता में कोई स्थायी आधार दिखाई नहीं देता। यह मन वास्तव में अत्यंत चंचल, प्रबल तथा हठीला है, हे कृष्ण — मैं तो इसे वायु के समान ही दुर्नियन्त्रित मानता हूँ। श्रीकृष्ण ने इसे स्वीकार करते हुए कहा कि निःसंदेह, हे महाबाहु, मन चंचल तथा कठिनाई से वश में आने वाला है — किंतु हे कुन्तीपुत्र, निरन्तर अभ्यास तथा वैराग्य के द्वारा, इसे वश में किया जा सकता है। असंयमी चित्त वाले के लिए योग को प्राप्त करना कठिन है, यह मैं मानता हूँ — किंतु उचित उपायों से प्रयत्नशील, संयमी चित्त वाले के लिए, इसे प्राप्त करना सम्भव है, यही मेरा मत है।
इस पर अर्जुन ने एक और भी गहन प्रश्न पूछा — जो श्रद्धावान साधक योग में प्रवृत्त तो हुआ, किंतु जिसका मन योग से विचलित हो गया, तथा जो योग की सिद्धि को प्राप्त किए बिना ही देहावसान को प्राप्त हो गया, हे महाबाहु, ऐसे असफल योगी की क्या गति होती है? क्या वह छिन्न-भिन्न बादल के समान, दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर, ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग से विचलित, आश्रयहीन होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? हे कृष्ण, मेरे इस संशय को पूर्णतः दूर कीजिए, क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई अन्य इसे दूर करने वाला नहीं है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पूर्ण आश्वासन देते हुए कहा — हे पार्थ, न तो इस लोक में, और न ही परलोक में, उसका कभी विनाश होता है, क्योंकि हे मेरे प्रिय, शुभ कर्म करने वाला कोई भी व्यक्ति कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। ऐसा असफल योगी, पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त करके, वहाँ दीर्घ काल तक निवास करने के पश्चात्, पवित्र तथा समृद्ध कुल में पुनः जन्म लेता है। अथवा वह स्वयं ज्ञानी योगियों के ही कुल में जन्म लेता है — यद्यपि इस संसार में ऐसा जन्म प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है। वहाँ वह अपने पूर्वजन्म की उसी बुद्धिमत्ता को पुनः प्राप्त कर लेता है, तथा वहीं से पुनः सिद्धि की ओर प्रयत्नशील हो जाता है। अपने पूर्व-अभ्यास के ही बल पर, वह अनायास ही आगे की ओर खिंचा चला जाता है — योग को जानने की इच्छा मात्र रखने वाला व्यक्ति भी, शास्त्रोक्त कर्मकाण्ड के फल से ऊपर उठ जाता है। किंतु जो योगी अत्यंत प्रयत्नपूर्वक साधना करता है, तथा अनेक जन्मों के अभ्यास से सिद्ध होकर, समस्त पापों से शुद्ध हो जाता है, वही अंततः परम गति को प्राप्त करता है।
श्रीकृष्ण के इस आश्वासन ने अर्जुन के मन को गहन संतोष प्रदान किया, क्योंकि उन्हें अब यह स्पष्ट हो चुका था कि आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर उठाया गया कोई भी कदम, चाहे वह इस जन्म में पूर्ण सिद्धि तक न भी पहुँचे, कभी निष्फल नहीं जाता — यह उस साधारण सांसारिक कर्म से सर्वथा भिन्न है, जिसका फल असफल होने पर पूर्णतः नष्ट हो जाता है। यही आश्वासन, आगे चलकर अनगिनत साधकों के लिए भी एक अत्यंत बड़ी प्रेरणा का स्रोत बना, क्योंकि इससे यह भय सदा के लिए दूर हो गया कि साधना के मार्ग पर असफल होने का अर्थ है, सब कुछ खो देना।
अंत में श्रीकृष्ण ने यह घोषणा की कि योगी, तपस्वियों से भी श्रेष्ठ माना जाता है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना जाता है, तथा कर्मकाण्डियों से भी श्रेष्ठ माना जाता है — इसलिए, हे अर्जुन, तुम योगी बनो। और समस्त योगियों में भी, जो श्रद्धापूर्वक, अपने अन्तःकरण को मुझमें ही लीन करके मेरी उपासना करता है, उसे ही मैं सबसे अधिक युक्ततम (परम योग-युक्त) मानता हूँ। इस प्रकार, षष्ठ अध्याय में श्रीकृष्ण, अर्जुन को ध्यान-योग की सम्पूर्ण साधना-पद्धति सिखाते हुए, मन की चंचलता पर विजय पाने का व्यावहारिक मार्ग बताते हैं, तथा यह आश्वासन भी देते हैं कि इस मार्ग पर किया गया प्रयत्न कभी व्यर्थ नहीं जाता — चाहे इस जन्म में सिद्धि न भी मिले, तो भी साधक अगले जन्मों में उसी साधना को आगे बढ़ाता रहता है, जब तक कि वह परम गति को प्राप्त न कर ले।
