षष्ठ अध्याय में ध्यान-योग की उस विस्तृत साधना-पद्धति को सुनने के पश्चात्, अर्जुन का मन अब उस परम तत्त्व को और भी गहराई से जानने के लिए व्याकुल हो उठा, जिसकी प्राप्ति के लिए यह समस्त साधना की जा रही थी। यह भाँपते हुए, श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उस गूढ़तम रहस्य को उद्घाटित करने का निश्चय किया। उन्होंने कहा कि हे पार्थ, अब सुनो कि मुझमें आसक्त चित्त होकर, योग का अभ्यास करते हुए, तथा मेरी ही शरण में आकर, तुम मुझे किस प्रकार सन्देह-रहित होकर, सम्पूर्णतः जान सकते हो। मैं तुम्हें यह ज्ञान, अनुभव-सहित, सम्पूर्णता से बताऊँगा — जिसे जान लेने के पश्चात्, इस संसार में और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता।
श्रीकृष्ण ने आगे एक अत्यंत मार्मिक सत्य भी प्रकट किया — हजारों मनुष्यों में से, कोई विरला ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और उन प्रयत्नशील सिद्ध साधकों में से भी, कोई विरला ही मुझे यथार्थ रूप से जान पाता है। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी प्रकृति के दो स्वरूपों का वर्णन किया, जो इस अध्याय का मूल आधार है — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार — इस प्रकार मेरी प्रकृति आठ भागों में विभक्त है, और यह मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है। किंतु हे महाबाहु, मेरी एक अन्य, परा (उच्चतर) प्रकृति को भी जानो — वह जीव-भूता प्रकृति, जिसके द्वारा ही यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया गया है। इन दोनों प्रकृतियों से ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति जानो — मैं ही इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति हूँ, और मैं ही इसका प्रलय भी हूँ। मुझसे बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है, हे धनञ्जय — जिस प्रकार मणियाँ एक धागे में गुँथी रहती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही पिरोया हुआ है।
श्रीकृष्ण ने इस दोहरी प्रकृति के रहस्य को और भी स्पष्ट करते हुए समझाया कि जिस प्रकार एक कुम्हार, मिट्टी से नाना प्रकार के पात्र बनाता है, किंतु उन सभी पात्रों में मूल रूप से वही मिट्टी विद्यमान रहती है, उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत् — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तथा मन-बुद्धि से निर्मित — मेरी ही अपरा प्रकृति का विस्तार है, जबकि इस सम्पूर्ण विस्तार को जीवन्त बनाए रखने वाली चेतना-शक्ति, मेरी परा प्रकृति है। यही परा प्रकृति है, जो प्रत्येक जीव में आत्मा के रूप में विद्यमान रहकर, उस जड़ प्रकृति को गति और चेतना प्रदान करती है — इन दोनों के संयोग से ही यह सम्पूर्ण सृष्टि सम्भव हो पाती है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत काव्यात्मक, हृदयस्पर्शी वर्णन किया, जिसमें उन्होंने संसार के प्रत्येक तत्त्व में अपनी ही उपस्थिति का साक्षात्कार कराया — हे कुन्तीपुत्र, मैं जल में रस (स्वाद) हूँ, मैं चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, मैं समस्त वेदों में ओंकार हूँ, मैं आकाश में शब्द हूँ, और मनुष्यों में पुरुषत्व हूँ। मैं पृथ्वी में पवित्र सुगन्ध हूँ, अग्नि में तेज हूँ, समस्त प्राणियों में जीवन हूँ, तथा तपस्वियों में तप हूँ। हे पार्थ, मुझे ही समस्त प्राणियों का सनातन बीज जानो — मैं ही बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ, तथा तेजस्वियों का तेज हूँ। मैं ही बलवानों का, काम और आसक्ति से रहित बल हूँ, तथा प्राणियों में, धर्म के विरुद्ध न जाने वाली कामना भी मैं ही हूँ, हे भरतश्रेष्ठ।
इस काव्यमय वर्णन को सुनते हुए, अर्जुन को ऐसा प्रतीत हुआ मानो सम्पूर्ण संसार ही एक नए दृष्टिकोण से उनके सम्मुख प्रकट हो रहा हो — जिस वृक्ष की छाया में वे कभी विश्राम करते थे, जिस नदी के जल से वे अपनी प्यास बुझाते थे, जिस अग्नि से वे अपना भोजन पकाते थे — यह सब कुछ अब उन्हें उसी परमात्मा के प्रत्यक्ष स्वरूप के रूप में दिखाई देने लगा। यही तो वह दृष्टि थी, जिसे प्राप्त करना समस्त साधना का चरम लक्ष्य माना गया है — संसार को त्यागना नहीं, अपितु संसार के प्रत्येक कण में उसी परम तत्त्व का दर्शन करना।
श्रीकृष्ण ने आगे प्रकृति के तीनों गुणों — सत्त्व, रज तथा तम — का भी रहस्य उद्घाटित किया, यह कहते हुए कि इन तीनों भावों को मुझसे ही उत्पन्न जानो, किंतु मैं उनमें नहीं हूँ, अपितु वे मुझमें ही हैं। इन्हीं तीन गुणों से मोहित होकर, यह सम्पूर्ण संसार, मुझे — जो इनसे परे तथा अविनाशी हूँ — पहचान नहीं पाता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गुणों से बनी यह मेरी दिव्य माया अत्यंत दुस्तर है — केवल वे ही, जो मेरी शरण में आते हैं, इस माया को पार कर पाते हैं। किंतु दुष्कर्मी, मूढ़, नराधम, माया द्वारा हरे गए ज्ञान वाले, तथा आसुरी स्वभाव का आश्रय लेने वाले, कभी मेरी शरण में नहीं आते।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों के उन चार प्रकारों का भी वर्णन किया, जो सज्जन होते हुए भी, भिन्न-भिन्न भावनाओं से मेरी उपासना करते हैं — आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (ज्ञान का इच्छुक), अर्थार्थी (धन का इच्छुक), तथा ज्ञानी। इनमें भी, जो नित्य मुझमें ही एकनिष्ठ भाव से भक्ति करने वाला ज्ञानी है, वही श्रेष्ठ माना जाता है — क्योंकि मुझे ज्ञानी अत्यंत प्रिय है, और वह ज्ञानी भी मुझे अत्यंत प्रिय है। श्रीकृष्ण ने कहा कि ये सभी भक्त उदार तो हैं ही, किंतु ज्ञानी को मैं अपनी ही आत्मा के समान मानता हूँ — क्योंकि वह स्थिर-चित्त होकर, मुझमें ही, परम लक्ष्य के रूप में स्थित रहता है। अनेक जन्मों के पश्चात्, "वासुदेव ही सब कुछ है" — इस सत्य को जानकर, ज्ञानी पुरुष मेरी शरण में आता है — ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।
श्रीकृष्ण ने इन चार प्रकार के भक्तों में भेद करते हुए भी, किसी के प्रति तनिक भी तिरस्कार का भाव नहीं दिखाया — उन्होंने स्पष्ट किया कि दुःख से पीड़ित होकर मेरी शरण में आने वाला आर्त भक्त हो, अथवा धन की कामना से आने वाला अर्थार्थी, दोनों ही अंततः मेरे ही मार्ग पर हैं, केवल उनकी समझ का स्तर भिन्न है। जिस प्रकार एक बालक पहले वर्णमाला सीखता है, और फिर धीरे-धीरे गहन शास्त्रों का अध्ययन करने योग्य बनता है, उसी प्रकार ये सभी भक्त भी, अपनी-अपनी वर्तमान अवस्था से आरम्भ करके, कालांतर में ज्ञानी भक्त की उसी उच्चतम अवस्था तक पहुँच सकते हैं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने किसी भी प्रकार की भक्ति को तुच्छ नहीं माना, अपितु प्रत्येक साधक को उसकी अपनी गति से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि जिनका ज्ञान विभिन्न कामनाओं के द्वारा हर लिया गया है, वे अपने-अपने स्वभाव से बँधकर, नियमों के अनुसार, अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं। जो भक्त, जिस भी रूप की श्रद्धापूर्वक उपासना करना चाहता है, मैं उसकी उसी श्रद्धा को अचल कर देता हूँ। उसी श्रद्धा से युक्त होकर, वह उस रूप की आराधना करता है, तथा उससे अपनी इच्छित वस्तुएँ प्राप्त करता है, जो वास्तव में मेरे द्वारा ही दी जाती हैं। किंतु अल्पबुद्धि वाले इन भक्तों का फल नाशवान होता है — देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, जबकि मेरे भक्त अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं।
इस विषय में श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत गहन उदाहरण भी दिया — उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कोई सामान्य मनुष्य, किसी महान सम्राट को साधारण वस्त्रों में देखकर, उसके वास्तविक ऐश्वर्य और सामर्थ्य को पहचान नहीं पाता, उसी प्रकार जब मैं मनुष्य के समान इस पृथ्वी पर प्रकट होता हूँ, तो अधिकांश लोग मेरे इस मानवीय रूप को देखकर ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, तथा मेरे भीतर छिपे उस अनन्त, अविनाशी स्वरूप को पहचानने का प्रयत्न ही नहीं करते। यही अज्ञान, युगों-युगों से मनुष्य को परमात्मा से दूर रखता आया है — क्योंकि लोग बाहरी रूप-रंग और परिस्थितियों को ही सत्य मान बैठते हैं, तथा उनके भीतर व्याप्त उस शाश्वत चेतना की खोज करने का कष्ट कभी नहीं उठाते।
श्रीकृष्ण ने आगे एक अत्यंत गहन, रहस्यमय सत्य भी बताया — अज्ञानीजन, मेरे परम, अविनाशी तथा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप को न जानते हुए, मुझ अव्यक्त को ही व्यक्त-रूप में प्रकट हुआ मान बैठते हैं। अपनी ही योगमाया से आवृत्त होने के कारण, मैं सबके सम्मुख प्रकट नहीं होता — यह मोहित संसार, मुझे अजन्मा और अविनाशी जान ही नहीं पाता। उन्होंने कहा कि हे अर्जुन, मैं भूत, वर्तमान तथा भविष्य के समस्त प्राणियों को जानता हूँ, किंतु मुझे कोई नहीं जानता। समस्त प्राणी, हे परन्तप, जन्म लेते ही, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्वों के मोह से मोहित हो जाते हैं, हे भारत।
किंतु जिन पुण्यात्मा पुरुषों के पाप नष्ट हो चुके हैं, तथा जो द्वंद्वों के इस मोह से मुक्त हो चुके हैं, वे ही दृढ़ निश्चय के साथ मेरी उपासना करते हैं। जो व्यक्ति, मेरी शरण लेकर, जरा और मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, वे ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, तथा सम्पूर्ण कर्म-तत्त्व को भलीभाँति जान लेते हैं। जो साधक मुझे अधिभूत (नश्वर जगत्), अधिदैव (दिव्य तत्त्व) तथा अधियज्ञ (यज्ञ के तत्त्व) के साथ जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी, युक्त-चित्त होकर, मुझे ही जानते हैं।
श्रीकृष्ण ने इस अध्याय के समापन पर अर्जुन को यह भी स्मरण कराया कि यह ज्ञान कोई ऐसा रहस्य नहीं है, जो केवल शास्त्रों के अध्ययन से प्राप्त हो जाए — इसके लिए निरन्तर अभ्यास, श्रद्धा तथा समर्पण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सदा विद्यमान रहता है, फिर भी बादलों की ओट में वह हमें दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी सदा प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान हूँ, किंतु माया के आवरण के कारण अधिकांश लोग मुझे पहचान नहीं पाते। यही आवरण, ज्ञान और भक्ति के संयुक्त प्रकाश से ही हटता है — और जिस क्षण यह आवरण हट जाता है, उसी क्षण साधक को यह प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है कि जिस परम तत्त्व की खोज में वह इतने जन्मों से भटक रहा था, वह तत्त्व कभी उससे दूर था ही नहीं, अपितु सदा उसके अपने ही भीतर विद्यमान था।
इस प्रकार, सप्तम अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दोहरी प्रकृति — अपरा और परा — का रहस्य समझाते हुए, यह प्रकट करते हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि का प्रत्येक कण, प्रत्येक तत्त्व, वस्तुतः उन्हीं का ही स्वरूप है — जल का स्वाद, अग्नि का तेज, सूर्य-चन्द्र का प्रकाश, तथा प्राणियों का जीवन, सब कुछ उन्हीं में व्याप्त है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनकी यह गुणमयी माया अत्यंत दुस्तर होते हुए भी, जो साधक श्रद्धा और समर्पण के साथ उनकी शरण में आता है, वह इसे सहजता से पार कर लेता है — तथा अनेक जन्मों की साधना के पश्चात्, "वासुदेव ही सब कुछ है" — इस परम सत्य को जानने वाला महात्मा ही, अंततः उस परम गन्तव्य को प्राप्त करता है, जिसे पाकर मनुष्य को फिर कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
