सप्तम अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ जैसे गूढ़ शब्दों के संक्षिप्त उल्लेख को सुनकर, अर्जुन के मन में इन सबके स्पष्ट अर्थ जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हो गई। उन्होंने विनम्रतापूर्वक एक साथ अनेक प्रश्न पूछे — हे पुरुषोत्तम, वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म किसे कहते हैं? अधिभूत किसे कहा गया है, तथा अधिदैव किसे? हे मधुसूदन, इस शरीर में अधियज्ञ कौन है, और वह किस प्रकार यहाँ विद्यमान है? तथा संयमी पुरुषों द्वारा, मृत्यु के समय, आपको किस प्रकार जाना जा सकता है?
श्रीकृष्ण ने एक-एक करके, अत्यंत स्पष्टता के साथ, इन समस्त प्रश्नों का उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि अक्षर, परम तत्त्व — उसे ही ब्रह्म जानो; अपने ही स्वभाव को अध्यात्म कहा जाता है; तथा प्राणियों की उत्पत्ति के कारणभूत विसर्ग (सृजन-शक्ति) को कर्म कहा गया है। नश्वर भाव को अधिभूत जानो, पुरुष (चेतन तत्त्व) को अधिदैव जानो, तथा हे देहधारियों में श्रेष्ठ, इस शरीर में मैं स्वयं ही अधियज्ञ हूँ। उन्होंने आगे उस अत्यंत प्रसिद्ध, कालजयी उपदेश की ओर संकेत किया, जो इस अध्याय का मूल आधार है — जो व्यक्ति, अंत काल में, शरीर त्यागते समय, केवल मेरा ही स्मरण करते हुए प्रस्थान करता है, वह निःसंदेह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है। मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, हे कुन्तीपुत्र, सदा उसी भाव में रमण करते रहने के कारण, वह उसी भाव को प्राप्त होता है।
इस अत्यंत सारगर्भित उत्तर से अर्जुन का मन कुछ शांत तो हुआ, किंतु साथ ही उनके मन में एक गहन व्यावहारिक चिंता भी उभर आई — यदि अंतिम क्षण का स्मरण ही मनुष्य की गति निर्धारित करता है, तो युद्धभूमि में, जहाँ मृत्यु किसी भी क्षण, बिना किसी पूर्व सूचना के आ सकती है, कोई भी योद्धा उस अंतिम, निर्णायक क्षण में अपने मन को किस प्रकार स्थिर रख पाएगा? यह भाँपते हुए, श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि यह चिंता स्वाभाविक तो है, किंतु निरर्थक है — क्योंकि मन की वह अंतिम अवस्था, अकस्मात् उत्पन्न नहीं होती, अपितु वह तो उन्हीं संस्कारों का प्रतिफल है, जिन्हें मनुष्य ने अपने सम्पूर्ण जीवन भर, निरन्तर अभ्यास के द्वारा अपने भीतर सुदृढ़ किया है।
इसलिए, हे अर्जुन, तुम सदा प्रत्येक क्षण मेरा ही स्मरण करते हुए युद्ध करो — मन और बुद्धि को मुझमें ही अर्पित करके, तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगे। योगाभ्यास से अनुशासित चित्त, अन्यत्र कहीं भी न भटकते हुए, निरन्तर चिन्तन करते हुए, हे पार्थ, उस दिव्य, परम पुरुष को ही प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ने आगे उस परम पुरुष का वह अत्यंत भव्य, दिव्य वर्णन किया, जिसका ध्यान करने वाला साधक, मृत्यु के समय भी अविचल रहता है — जो सर्वज्ञ, पुरातन कवि है, जो सबका नियन्ता है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, जो समस्त का आधार है, जिसका स्वरूप अचिन्त्य है, तथा जो सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे है — भक्तियुक्त, अविचल मन से, तथा योगबल से अपने प्राणों को दोनों भौंहों के मध्य पूर्णतः स्थिर करके, जो साधक इस परम दिव्य पुरुष का ध्यान करता है, वह अंततः उसी को प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण ने इसी सन्दर्भ में एक अत्यंत सुंदर उपमा भी दी — जिस प्रकार एक कुशल धनुर्धर, वर्षों के निरन्तर अभ्यास के पश्चात्, बिना किसी सचेत विचार के भी, अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा लेता है, क्योंकि यह कौशल अब उसके भीतर स्वाभाविक हो चुका है — उसी प्रकार, जो साधक वर्षों तक निरन्तर परमात्मा का स्मरण करने का अभ्यास करता है, उसके लिए भी अंतिम क्षण में वह स्मरण, किसी विशेष प्रयत्न के बिना ही, सहज रूप से प्रकट हो जाता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि साधना को टालना नहीं चाहिए, अपितु आज से, अभी से ही आरम्भ कर देना चाहिए — क्योंकि कोई भी नहीं जानता कि वह निर्णायक क्षण कब आएगा।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसके पश्चात् उस अवस्था का भी संक्षिप्त वर्णन किया, जिसे वेदवेत्ता अक्षर कहते हैं, जिसमें वीतराग तपस्वी प्रवेश करते हैं, तथा जिसकी कामना से साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। उन्होंने बताया कि समस्त इन्द्रिय-द्वारों को बन्द करके, मन को हृदय में संयमित करके, अपने प्राण को मस्तक में स्थिर करके, योग-धारणा में स्थित होकर — तथा "ॐ" इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए, मेरा स्मरण करते हुए, जो व्यक्ति शरीर त्यागकर प्रस्थान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि जो साधक निरन्तर मेरा ही चिन्तन करता है, जिसका मन अन्यत्र कहीं नहीं जाता, ऐसे नित्य-युक्त योगी के लिए, हे पार्थ, मैं सहजता से सुलभ हूँ। जो महात्मा मुझे प्राप्त कर चुके हैं, तथा परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं, वे इस दुःखालय, अनित्य संसार में पुनः जन्म नहीं लेते।
इस बिन्दु पर अर्जुन के मन में यह भी विचार आया कि क्या यह मार्ग केवल उन्हीं साधकों के लिए सुलभ है, जो संसार त्यागकर, वन में जाकर, कठोर तप करते हैं? किंतु श्रीकृष्ण के इन्हीं वचनों में इसका उत्तर भी निहित था — उन्होंने स्वयं अर्जुन को युद्धभूमि में खड़े रहते हुए ही, कर्तव्य-पालन करते हुए ही, इस स्मरण-साधना का अभ्यास करने का आदेश दिया था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मार्ग किसी विशेष परिस्थिति अथवा आश्रम तक सीमित नहीं है — चाहे मनुष्य युद्धभूमि में हो, चाहे राजसभा में, चाहे अपने घर में, वह प्रत्येक अवस्था में, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, अपने मन के एक कोने में परमात्मा का यह निरन्तर स्मरण बनाए रख सकता है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत विस्मयकारी, विराट काल-गणना भी प्रकट की, जिसने कालांतर में भारतीय दर्शन की समय-अवधारणा को ही आकार दिया — ब्रह्मा का एक दिन, हजार चतुर्युगों के बराबर होता है, तथा उनकी रात्रि भी हजार युगों के बराबर — यह जो जानते हैं, वे ही वास्तव में दिन और रात्रि के तत्त्व को जानते हैं। उस दिन के आगमन पर, अव्यक्त से समस्त व्यक्त प्राणी प्रकट होते हैं, तथा रात्रि के आगमन पर, वे उसी अव्यक्त में पुनः विलीन हो जाते हैं। यही प्राणी-समूह, बारम्बार उत्पन्न होकर, विवशतापूर्वक रात्रि के आगमन पर लीन हो जाता है, हे पार्थ, तथा दिन के आगमन पर पुनः प्रकट होता है। किंतु इस अव्यक्त से भी परे, एक अन्य सनातन अव्यक्त भाव है, जो समस्त प्राणियों के नष्ट होने पर भी कभी नष्ट नहीं होता।
इस विराट काल-गणना को सुनकर, अर्जुन के मन में सृष्टि की क्षणभंगुरता का वह गहन बोध उत्पन्न हुआ, जो मनुष्य के समस्त सांसारिक अहंकार को धूल में मिला देने वाला है — जिन साम्राज्यों, जिन उपलब्धियों तथा जिन सम्बन्धों को मनुष्य इतना स्थायी और महत्वपूर्ण मान बैठता है, वे सब, इस विराट काल-चक्र के समक्ष, एक क्षणभंगुर तरंग के समान ही प्रतीत होने लगे। यही तो वह दृष्टिकोण है, जिसे प्राप्त कर लेने के पश्चात्, मनुष्य सांसारिक उपलब्धियों के प्रति अपने अत्यधिक मोह से स्वाभाविक रूप से मुक्त होने लगता है — न इसलिए कि वे उपलब्धियाँ तुच्छ हैं, अपितु इसलिए कि उनकी वास्तविक प्रकृति को अब वह भलीभाँति समझ चुका है।
इसी परम अव्यक्त को अक्षर कहा जाता है, इसे ही परम गति कहा जाता है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् पुनः लौटना नहीं पड़ता — यही मेरा परम धाम है। हे पार्थ, वह परम पुरुष, अनन्य भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है, जिसके भीतर समस्त प्राणी निवास करते हैं, तथा जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। श्रीकृष्ण ने आगे उस अत्यंत रहस्यमय विषय का भी वर्णन किया, जिसे गीता में देवयान और पितृयान — दो मार्गों के नाम से जाना जाता है — अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, तथा उत्तरायण के छह महीने — इस मार्ग से प्रस्थान करने वाले ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्म को ही प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत, धूम्र, रात्रि, कृष्ण पक्ष, तथा दक्षिणायन के छह महीने — इस मार्ग से प्रस्थान करने वाला योगी, चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर, पुनः लौट आता है। ये दोनों मार्ग — शुक्ल और कृष्ण — इस जगत् के सनातन माने जाते हैं; इनमें से एक से जाने वाला पुनः नहीं लौटता, जबकि दूसरे से जाने वाला पुनः लौट आता है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह भी बताया कि इन दोनों मार्गों को भलीभाँति जानने वाला कोई भी योगी, कभी मोहित नहीं होता — इसलिए, हे अर्जुन, तुम सदा योग में ही स्थित रहो। उन्होंने अंत में यह भी उद्घाटित किया कि वेदाध्ययन, यज्ञ, तप तथा दान से जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, उस समस्त फल से भी बढ़कर, योगी इस ज्ञान को जानकर उस आदि, परम धाम को ही प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण ने इन दोनों मार्गों — देवयान और पितृयान — के इस रहस्य को इसलिए भी उद्घाटित किया, ताकि साधक अनावश्यक भय से मुक्त हो सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृष्ण-पक्ष अथवा दक्षिणायन के मार्ग से प्रस्थान करने वाला योगी भी नष्ट नहीं होता, अपितु वह केवल चन्द्रलोक को प्राप्त होकर, पुण्य-फल भोगने के पश्चात्, पुनः इस संसार में जन्म ले लेता है — यह भी अंततः उसी साधना-यात्रा का एक भाग है, कोई असफलता नहीं। इस प्रकार, श्रीकृष्ण ने यह भी सिद्ध किया कि आध्यात्मिक साधना में उठाया गया कोई भी कदम, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में समाप्त क्यों न हो, कभी पूर्णतः निष्फल नहीं जाता — केवल उस मार्ग की गति में अंतर होता है, जो अंततः साधक के अपने ही स्मरण और अभ्यास की गहराई पर निर्भर करता है।
इस प्रकार अर्जुन के सात प्रश्नों का विस्तृत उत्तर देते हुए, श्रीकृष्ण ने अष्टम अध्याय में मृत्यु के रहस्य को उद्घाटित किया — कि अंतिम क्षण का स्मरण ही मनुष्य की अगली गति निर्धारित करता है, किंतु यह अंतिम स्मरण, अचानक नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन भर के अभ्यास से ही निश्चित होता है। इसीलिए उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि साधक को केवल मृत्यु के समय ही नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षण में, निरन्तर परमात्मा का स्मरण करते रहना चाहिए — क्योंकि जिस प्रकार जीवन भर जिस दिशा में मन को प्रशिक्षित किया जाता है, अंतिम क्षण में स्वाभाविक रूप से वही दिशा प्रकट होती है। यही कारण है कि निरन्तर अभ्यास और भक्ति का यह मार्ग, अकस्मात् अपनाया जाने वाला उपाय नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन की एक सतत साधना है, जिसके फलस्वरूप ही मनुष्य अंततः उस अक्षर, अविनाशी परम धाम को प्राप्त कर सकता है, जहाँ से पुनः इस जन्म-मृत्यु के चक्र में लौटना नहीं पड़ता।
