अध्याय ९

राजविद्या-राजगुह्य योग

अष्टम अध्याय में मृत्यु, काल तथा अक्षर ब्रह्म के इस गहन रहस्य को उद्घाटित करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रति अपने विशेष स्नेह और विश्वास को प्रकट करते हुए कहा कि अब मैं तुम्हें, जो दोष-दृष्टि से रहित हो, यह अत्यंत गोपनीय ज्ञान, अनुभव-सहित, प्रदान करूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से सर्वथा मुक्त हो जाओगे। उन्होंने इस ज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह राजविद्या है, राजगुह्य (राजाओं का भी परम गोपनीय रहस्य) है, परम पवित्र करने वाला है, प्रत्यक्ष अनुभव में आने योग्य है, धर्मयुक्त है, अत्यंत सुगमता से आचरण में लाया जा सकता है, तथा अविनाशी है। श्रीकृष्ण ने आगे उन दुर्भाग्यशाली मनुष्यों की भी चर्चा की, जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते — ऐसे व्यक्ति, हे परन्तप, मुझे प्राप्त न करके, इस मृत्युलोक के संसार-चक्र में ही बारम्बार लौटते रहते हैं। उन्होंने वह अत्यंत गहन दार्शनिक रहस्य भी प्रकट किया, जिसे "ईश्वरीय योग" कहा गया है — यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त स्वरूप से ही व्याप्त है; समस्त प्राणी मुझमें ही स्थित हैं, किंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। और फिर भी, प्राणी वास्तव में मुझमें स्थित नहीं हैं — इस मेरी दिव्य माया को देखो! मेरी आत्मा, जो प्राणियों को धारण करने वाली तथा उनकी उत्पत्ति का कारण है, स्वयं प्राणियों में निवास नहीं करती। जिस प्रकार सर्वत्र विचरण करने वाला महान वायु, सदा आकाश में ही स्थित रहता है, उसी प्रकार समस्त प्राणी मुझमें ही स्थित हैं, ऐसा जानो। श्रीकृष्ण ने आगे सृष्टि-चक्र का भी वर्णन किया — हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अंत में समस्त प्राणी मेरी प्रकृति में ही विलीन हो जाते हैं, तथा कल्प के आरम्भ में, मैं उन्हें पुनः रच देता हूँ। अपनी ही प्रकृति को अधीन करके, इस प्रकृति के बल से विवश हुए, इस समस्त प्राणी-समूह को, मैं बारम्बार रचता रहता हूँ। किंतु हे धनञ्जय, ये कर्म मुझे कभी बाँधते नहीं, क्योंकि मैं इन कर्मों में उदासीन-सा, अनासक्त होकर ही स्थित रहता हूँ। मेरी अध्यक्षता में ही, प्रकृति चराचर जगत् को रचती है — इसी कारण से, हे कुन्तीपुत्र, यह संसार-चक्र गतिशील रहता है। श्रीकृष्ण ने इस "ईश्वरीय योग" के रहस्य को और भी स्पष्ट करते हुए एक अत्यंत सुंदर उपमा दी — जिस प्रकार समुद्र में उठने वाली प्रत्येक लहर, समुद्र के जल से ही बनी होती है, तथा अंततः उसी में विलीन हो जाती है, फिर भी समुद्र स्वयं किसी एक लहर पर निर्भर नहीं रहता, उसी प्रकार समस्त प्राणी मुझसे ही उत्पन्न होकर, मुझमें ही स्थित रहते हैं, किंतु मैं किसी एक प्राणी विशेष पर निर्भर नहीं रहता — यह भेद ही मेरी उस दिव्य माया का रहस्य है, जिसे साधारण बुद्धि से समझ पाना अत्यंत कठिन है। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत मार्मिक चेतावनी भी दी — जब मैं मनुष्य-रूप धारण करता हूँ, तब मूढ़ लोग, समस्त प्राणियों के महान ईश्वर के रूप में मेरे उस उच्चतर स्वरूप को न जानते हुए, मेरा तिरस्कार करते हैं। ऐसे लोगों की आशाएँ व्यर्थ होती हैं, उनके कर्म व्यर्थ होते हैं, उनका ज्ञान भी व्यर्थ होता है, तथा वे विवेकहीन होकर, राक्षसी और आसुरी स्वभाव को ही धारण कर लेते हैं। इसके विपरीत, हे पार्थ, जो महात्मा दैवी प्रकृति का आश्रय लेते हैं, वे अविचल मन से मेरी उपासना करते हैं, यह जानते हुए कि मैं ही समस्त प्राणियों का अविनाशी उद्गम हूँ। वे निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए, दृढ़ व्रत लेकर प्रयत्नशील रहते हुए, भक्तिपूर्वक मुझे प्रणाम करते हुए, नित्य-युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे भक्ति के उन विविध रूपों का भी वर्णन किया, जिनसे साधक उन्हें पूजते हैं — कुछ साधक ज्ञान-यज्ञ के द्वारा, मुझे एक के रूप में, तो कुछ अनेक, सर्वतोमुख रूपों में पूजते हैं। उन्होंने वह अत्यंत भव्य, आत्म-प्रकाशन करने वाला उपदेश दिया, जो इस अध्याय का एक शिखर-बिन्दु है — मैं ही यज्ञ-विधि हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को अर्पित स्वधा हूँ, मैं ही औषधि हूँ, मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं ही अग्नि हूँ, तथा मैं ही आहुति हूँ। मैं ही इस जगत् का पिता हूँ, माता हूँ, धाता हूँ, तथा पितामह हूँ; मैं ही जानने योग्य है, मैं ही पवित्र करने वाला ओंकार हूँ, तथा मैं ही ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ। मैं ही गति हूँ, भर्ता हूँ, प्रभु हूँ, साक्षी हूँ, निवास-स्थान हूँ, शरण हूँ, सुहृद हूँ, उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, आधार हूँ, तथा अविनाशी बीज हूँ। मैं ही ताप देता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ; हे अर्जुन, मैं ही अमृत हूँ, और मृत्यु भी मैं ही हूँ — मैं ही सत् हूँ, और असत् भी मैं ही हूँ। श्रीकृष्ण के इस आत्म-प्रकाशन को सुनकर, अर्जुन का मन विस्मय और श्रद्धा से भर उठा — यह पहली बार था, जब उन्होंने अपने ही सखा को, इस सम्पूर्ण सृष्टि के प्रत्येक तत्त्व, प्रत्येक क्रिया, तथा प्रत्येक ग्रन्थ के मूल स्रोत के रूप में साक्षात् घोषित करते सुना। जिस यज्ञ को वे बचपन से एक पवित्र किंतु पृथक अनुष्ठान मानते आए थे, वह भी अब उन्हें स्वयं परमात्मा का ही एक रूप प्रतीत होने लगा — यही तो वह दृष्टि थी, जिसे श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन के भीतर जागृत करना चाहते थे, कि संसार का कोई भी कार्य, परमात्मा से पृथक नहीं है। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उन साधकों की भी चर्चा की, जो केवल स्वर्ग-प्राप्ति की कामना से, वेदोक्त यज्ञों के द्वारा मेरी उपासना करते हैं — तीनों वेदों को जानने वाले, सोमरस पीने वाले, पापरहित हुए ऐसे साधक, स्वर्ग-मार्ग की याचना करते हुए, इन्द्रलोक को प्राप्त होकर, वहाँ देवताओं के दिव्य भोगों का आनन्द लेते हैं। किंतु उस विशाल स्वर्गलोक का भोग करने के पश्चात्, जब उनका पुण्य क्षीण हो जाता है, तो वे पुनः इस मृत्युलोक में लौट आते हैं — इस प्रकार, त्रैगुण्य वेद-धर्म का अनुसरण करते हुए, कामनाओं की इच्छा रखने वाले, केवल आवागमन को ही प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत, जो साधक अनन्य भाव से, केवल मेरा ही चिन्तन करते हुए, मेरी उपासना करते हैं, हे कुन्तीपुत्र, उन नित्य-युक्त भक्तों का योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। अन्य देवताओं के जो भक्त, श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे भी वस्तुतः मेरी ही पूजा करते हैं, यद्यपि विधि-सम्मत रूप से नहीं। क्योंकि समस्त यज्ञों का भोक्ता तथा स्वामी, मैं ही हूँ — किंतु वे मुझे तत्त्वतः नहीं जानते, इसी कारण वे भ्रष्ट हो जाते हैं। देवताओं के व्रत लेने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों की उपासना करने वाले पितरों को, भूत-प्रेतों की पूजा करने वाले भूत-प्रेतों को — किंतु मेरी उपासना करने वाले भक्त, अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने भक्ति के अनेक स्तरों का वर्णन करते हुए, अनजाने में की गई अन्य देवताओं की उपासना को भी तिरस्कृत नहीं किया, अपितु यह स्पष्ट किया कि श्रद्धा का हर छोटा-सा प्रयास भी, अंततः उसी एक परम तत्त्व की ओर ही ले जाता है, भले ही साधक को इसका पूर्ण ज्ञान अभी न हो। यह उदारता, इस अध्याय की सबसे सुंदर विशेषताओं में से एक है — क्योंकि इसमें कहीं भी किसी अन्य उपासना-पद्धति की निंदा नहीं की गई, अपितु प्रत्येक साधक को उसकी अपनी वर्तमान समझ से ही, धीरे-धीरे उच्चतम सत्य की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। यहीं श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत सरल, हृदयस्पर्शी उपदेश भी दिया, जो आज भी अनगिनत भक्तों के लिए भक्ति का सबसे सुलभ द्वार बना हुआ है — जो कोई भी भक्त, भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पित करता है, उस शुद्ध-हृदय भक्त की वह भेंट, मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ। हे कुन्तीपुत्र, तुम जो भी कर्म करो, जो भी भोजन करो, जो भी हवन करो, जो भी दान दो, तथा जो भी तप करो, वह सब मुझे ही अर्पित करते हुए करो। इस प्रकार, तुम शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्म-बन्धन से सर्वथा मुक्त हो जाओगे — संन्यास-योग से युक्त-चित्त होकर, मुक्त होकर, तुम मुझे ही प्राप्त होगे। मैं समस्त प्राणियों के प्रति समान हूँ — न कोई मेरा द्वेष्य है, न कोई प्रिय; किंतु जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, वे मुझमें हैं, और मैं भी उनमें हूँ। श्रीकृष्ण ने आगे वह अत्यंत करुणामय, आश्वासनदायक उपदेश भी दिया — यदि कोई अत्यंत दुराचारी व्यक्ति भी, अनन्य भाव से मेरी भक्ति करे, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने सम्यक् निश्चय कर लिया है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है, तथा शाश्वत शांति को प्राप्त होता है — हे कुन्तीपुत्र, निश्चयपूर्वक जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। हे पार्थ, मेरी शरण में आकर, स्त्रियाँ, वैश्य, तथा शूद्र भी — जो नीच योनि के माने जाते हैं — वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं। फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इस अनित्य, सुखरहित संसार को प्राप्त करके, तुम मेरी ही भक्ति करो। श्रीकृष्ण के इस उपदेश ने अर्जुन के मन में भक्ति के प्रति एक नया, अत्यंत सहज विश्वास उत्पन्न कर दिया। इससे पूर्व उन्होंने ज्ञान, कर्म तथा ध्यान के जिन कठिन मार्गों के विषय में सुना था, वे सब सामान्य गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए कहीं दूर, कठिन साधना प्रतीत होते थे — किंतु यह भक्ति-मार्ग, जिसमें एक पत्ते अथवा जल की एक बूँद का भी सच्चे हृदय से अर्पण पर्याप्त माना गया, उन्हें अत्यंत सुलभ और आश्वस्त करने वाला जान पड़ा। यही कारण है कि आगे चलकर संसार भर में, भक्ति-मार्ग को साधारण जन के लिए सबसे अधिक सुगम माना गया, क्योंकि इसमें न तो विशेष शिक्षा की आवश्यकता है, न कठोर तप की, अपितु केवल निष्कपट श्रद्धा की। अंत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह संक्षिप्त, किंतु सम्पूर्ण भक्ति-मार्ग का सार दिया — अपने मन को मुझमें ही स्थिर करो, मेरे ही भक्त बनो, मुझे ही यज्ञ अर्पित करो, मुझे ही प्रणाम करो — इस प्रकार अपने आपको मुझमें युक्त करके, तथा मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, तुम अवश्य ही मुझे प्राप्त होगे। इस प्रकार, नवम अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष उस राजविद्या को उद्घाटित करते हैं, जो न केवल परम गोपनीय है, अपितु सरलतम भी — जहाँ एक ओर वे स्वयं को सम्पूर्ण सृष्टि के प्रत्येक तत्त्व के रूप में प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर वे यह भी सिद्ध करते हैं कि उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी जटिल कर्मकाण्ड की नहीं, अपितु केवल एक पत्ते, एक पुष्प अथवा एक बूँद जल के शुद्ध, भक्तिपूर्ण अर्पण की ही आवश्यकता है।