अध्याय १०

विभूति योग

नवम अध्याय में उस परम राजविद्या को सुनने के पश्चात्, अर्जुन के मन में श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और भी गहन हो चुकी थी। यह भाँपते हुए, श्रीकृष्ण ने स्वयं ही आगे कहा कि हे महाबाहु, अब पुनः मेरे परम वचन को सुनो — तुम्हारे कल्याण की कामना से ही मैं तुम्हें, जो अत्यंत प्रसन्न-चित्त हो, यह उपदेश दे रहा हूँ। उन्होंने कहा कि न तो देवताओं का समूह, और न ही महर्षिगण, मेरी उत्पत्ति को जानते हैं — क्योंकि मैं ही, प्रत्येक प्रकार से, देवताओं और महर्षियों का भी आदि-स्रोत हूँ। जो व्यक्ति मुझे अजन्मा, अनादि, तथा लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में अमोहित होकर, समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, भय और अभय, अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश तथा अपयश — प्राणियों के ये समस्त, विविध भाव, मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। सप्तर्षिगण तथा चार मनु भी, मेरे ही समान स्वभाव वाले, मेरे मन से ही उत्पन्न हुए थे — उन्हीं से इस संसार की यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न हुई। जो व्यक्ति मेरी इस विभूति (महिमा) तथा योग-शक्ति को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह अविचल योग से युक्त हो जाता है — इसमें कोई सन्देह नहीं है। श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि मैं ही समस्त सृष्टि का उद्गम हूँ, तथा सब कुछ मुझसे ही प्रवाहित होता है — इस सत्य को जानकर, ज्ञानीजन, इसी दृढ़ निश्चय के साथ मेरी उपासना करते हैं। मुझमें ही चित्त लगाकर, अपने जीवन को मुझे ही समर्पित करके, एक-दूसरे को प्रबुद्ध करते हुए, तथा निरन्तर मेरी ही चर्चा करते हुए, वे संतुष्ट और आनंदित रहते हैं। जो भक्त निरन्तर, प्रेमपूर्वक मेरी उपासना में लगे रहते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धि-योग प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे ही प्राप्त होते हैं। केवल उनके प्रति अनुकम्पा से ही, उन्हीं के भीतर निवास करते हुए, मैं ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से, अज्ञान-जनित अंधकार का नाश कर देता हूँ। इस उपदेश को सुनकर, अर्जुन का हृदय भक्ति और विस्मय से भर उठा, तथा उन्होंने कहा — आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं; समस्त ऋषिगण आपको सनातन, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा तथा सर्वव्यापी कहते हैं। देवर्षि नारद, असित, देवल तथा स्वयं व्यास मुनि भी ऐसा ही कहते हैं, और अब आप स्वयं भी मुझसे यही कह रहे हैं। हे केशव, आप जो कुछ भी मुझसे कह रहे हैं, मैं उसे सर्वथा सत्य मानता हूँ, क्योंकि हे भगवन्, न तो देवता और न ही दानव, आपके इस प्राकट्य को जान पाते हैं। हे परम पुरुष, हे भूतों के उद्गम, हे भूतेश, हे देवदेव, हे जगत्पते, आप स्वयं ही अपने आपको, स्वयं के द्वारा जानते हैं। अर्जुन का यह स्तवन कोई सामान्य प्रशंसा-वचन नहीं था, अपितु वह एक ऐसे हृदय की सहज अभिव्यक्ति थी, जिसने अभी-अभी यह अनुभव किया था कि जिस सखा के साथ उसने बचपन से लेकर अब तक इतने वर्ष व्यतीत किए, वह वस्तुतः स्वयं परमात्मा है। इसी भावविह्वल अवस्था में, अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि अपनी उन दिव्य विभूतियों का, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं, कृपया मुझे बिना किसी संकोच के विस्तार से बताइए। हे योगिन्, निरन्तर ध्यान के द्वारा मैं आपको किस प्रकार जान सकूँ? तथा हे भगवन्, किन-किन विविध भावों में मुझे आपका चिन्तन करना चाहिए? उन्होंने पुनः आग्रह किया कि हे जनार्दन, अपने योग और विभूति का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए, क्योंकि आपकी इस अमृततुल्य वाणी को सुनते हुए, मुझे कभी तृप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस आग्रह को स्वीकार करते हुए कहा कि अच्छा, अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करूँगा, किंतु केवल प्रमुख विभूतियों का ही, क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ, मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। उन्होंने कहा कि हे गुडाकेश, मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ — मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, मध्य तथा अंत भी हूँ। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उन अनगिनत विभूतियों का वह भव्य, काव्यात्मक वर्णन आरम्भ किया, जो इस अध्याय का सर्वाधिक स्मरणीय अंश है — आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में तेजस्वी सूर्य हूँ, मरुतों में मरीचि हूँ, तथा नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ। वेदों में मैं सामवेद हूँ, देवताओं में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ, तथा प्राणियों में चेतना हूँ। रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्ष-राक्षसों में धनाध्यक्ष कुबेर हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ, तथा शिखरधारी पर्वतों में मेरु हूँ। श्रीकृष्ण की यह वाणी, मानो एक अनवरत, दिव्य संगीत के समान प्रवाहित होती जा रही थी — प्रत्येक श्रेणी की सर्वोत्तम, सर्वाधिक तेजस्वी वस्तु का उल्लेख करते हुए, वे यह सिद्ध कर रहे थे कि सृष्टि में जहाँ भी उत्कृष्टता, तेज अथवा महिमा दिखाई देती है, वह वास्तव में उन्हीं की उपस्थिति का प्रमाण है। पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो, सेनापतियों में मैं स्कंद (कार्तिकेय) हूँ, तथा जलाशयों में समुद्र हूँ। महर्षियों में मैं भृगु हूँ, शब्दों में एकाक्षर ओंकार हूँ, यज्ञों में जप-यज्ञ हूँ, तथा स्थावरों में हिमालय हूँ। समस्त वृक्षों में मैं अश्वत्थ (पीपल) हूँ, देवर्षियों में नारद हूँ, गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ, तथा सिद्धों में कपिल मुनि हूँ। अश्वों में मुझे उच्चैःश्रवा जानो, जो अमृत-मंथन से उत्पन्न हुआ था; श्रेष्ठ गजों में मैं ऐरावत हूँ, तथा मनुष्यों में राजा हूँ। शस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गौओं में कामधेनु हूँ, प्रजनन का हेतु कन्दर्प (कामदेव) हूँ, तथा सर्पों में वासुकि हूँ। अर्जुन इस विस्तृत सूची को सुनते हुए, बार-बार अपने चारों ओर के संसार को एक नई दृष्टि से देखने लगे — जिस अश्वत्थ वृक्ष की छाया में वे कभी विश्राम करते थे, जिस गंगा में उन्होंने अनेक बार स्नान किया था, तथा जिस सिंह की गर्जना उन्होंने वनों में सुनी थी, वे सब अब उन्हें उसी परमात्मा के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि प्रतीत होने लगे, जिनके साथ वे रथ पर बैठे थे। नागों में मैं अनन्त (शेषनाग) हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ, तथा शासकों में यमराज हूँ। दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में काल स्वयं हूँ, पशुओं में मृगराज सिंह हूँ, तथा पक्षियों में विनतानन्दन गरुड़ हूँ। पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ, मत्स्यों में मकर हूँ, तथा नदियों में गंगा हूँ। सृष्टियों में मैं आदि, मध्य तथा अंत हूँ, हे अर्जुन; विद्याओं में अध्यात्म-विद्या हूँ, तथा वाद-विवाद करने वालों में सम्यक् निष्कर्ष (वाद) हूँ। अक्षरों में मैं अकार हूँ, समासों में द्वंद्व समास हूँ, अक्षय काल भी मैं ही हूँ, तथा सब ओर मुख वाला विधाता भी मैं ही हूँ। मैं ही सर्वहारी मृत्यु हूँ, तथा भविष्य में उत्पन्न होने वालों का उद्गम भी मैं ही हूँ; स्त्रैण भावों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति तथा क्षमा हूँ। सामवेद के गीतों में मैं बृहत्साम हूँ, छंदों में गायत्री छंद हूँ, महीनों में मार्गशीर्ष हूँ, तथा ऋतुओं में पुष्पों से भरा वसंत हूँ। मैं छलियों का जुआ हूँ, तेजस्वियों का तेज हूँ, विजय हूँ, संकल्प हूँ, तथा सात्त्विक पुरुषों की सत्त्वगुणी शक्ति भी हूँ। इसी क्रम में, श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत विलक्षण, आत्मीय स्पर्श भी जोड़ा — उन्होंने यह घोषित किया कि इस सूची में, वे स्वयं अपने ही सखा और शिष्य को भी सम्मिलित करते हैं। वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तुम स्वयं हूँ, मुनियों में व्यास हूँ, तथा कवियों में शुक्राचार्य हूँ। शासकों में मैं दण्ड हूँ, विजय के इच्छुकों की नीति हूँ, गोपनीय विषयों में मौन हूँ, तथा ज्ञानियों का ज्ञान भी मैं ही हूँ। इस प्रकार, हे अर्जुन, जो भी किसी प्राणी का बीज है, वह भी मैं ही हूँ — इस संसार में ऐसा कोई भी चर अथवा अचर प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना अस्तित्व में रह सके। श्रीकृष्ण ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है, हे परन्तप — यह तो मैंने केवल संक्षेप में, अपनी विभूति के विस्तार का संकेत मात्र दिया है। पाण्डवों में स्वयं धनञ्जय — अर्थात् अर्जुन स्वयं — को अपनी विभूति में गिनते हुए, श्रीकृष्ण ने मानो यह अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्पष्ट कर दिया कि अर्जुन के भीतर भी वही दिव्य तेज विद्यमान है, जिसकी शक्ति से वे इस युद्ध में अपने कर्तव्य का पालन कर सकेंगे — यह कोई साधारण प्रशंसा नहीं, अपितु एक सूक्ष्म, अप्रत्यक्ष आशीर्वाद भी था, जिसने अर्जुन के मन में एक नई शक्ति और आत्मविश्वास का संचार किया। उन्होंने आगे कहा कि जो भी वस्तु विभूतिमान, श्रीसम्पन्न अथवा शक्तिशाली प्रतीत होती है, हे अर्जुन, उसे मेरे ही तेज के एक अंशमात्र से उत्पन्न जानो। किंतु इस विस्तृत ज्ञान को जानने से तुम्हें क्या लाभ होगा? हे अर्जुन, मैं तो इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक ही अंश से धारण किए हुए, सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित हूँ। श्रीकृष्ण के इस उपदेश ने अर्जुन के भीतर एक सर्वथा नई अनुभूति जागृत कर दी — अब तक उन्होंने संसार को पृथक्-पृथक् वस्तुओं और घटनाओं के समूह के रूप में देखा था, किंतु इस वर्णन को सुनने के पश्चात्, उन्हें प्रतीत होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत्, वास्तव में एक ही चेतना का अनेकरूपी विस्तार मात्र है। यही वह अनुभूति थी, जिसने आगे उनके मन में उस दिव्य विराट स्वरूप को साक्षात् नेत्रों से देखने की अदम्य जिज्ञासा को जन्म दिया — क्योंकि शब्दों में वर्णित इस महिमा को सुनना एक बात थी, किंतु उसे अपनी ही आँखों से प्रत्यक्ष देख लेना, सर्वथा भिन्न, कहीं अधिक गहन अनुभव होने वाला था। इस प्रकार, दशम अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन के समक्ष अपनी उन अनंत विभूतियों का साक्षात्कार कराते हैं, जो सृष्टि के प्रत्येक श्रेष्ठ, महान तथा तेजस्वी तत्त्व में समाहित हैं — हिमालय से लेकर गंगा तक, सिंह से लेकर गरुड़ तक, तथा ओंकार से लेकर गायत्री तक — और यह सिद्ध करते हैं कि यह सम्पूर्ण दृश्यमान संसार, वस्तुतः उन्हीं की महिमा के एक अंशमात्र का ही विस्तार है। यही वह क्षण भी है, जिसने अर्जुन के हृदय में उस दिव्य विराट स्वरूप को साक्षात् देखने की तीव्र अभिलाषा जागृत कर दी, जो आगामी अध्याय में साकार होने वाली थी।