दशम अध्याय में श्रीकृष्ण की उन अनंत विभूतियों का वर्णन सुनकर, अर्जुन का मन उस परम रहस्य को अब केवल शब्दों में नहीं, अपितु अपनी ही आँखों से साक्षात् देखने के लिए अत्यंत व्याकुल हो उठा। उन्होंने कृतज्ञतापूर्वक कहा कि हे कमलनयन, आपने अपनी अनुकम्पा से, अध्यात्म से सम्बन्धित यह परम गोपनीय उपदेश देकर, मेरे इस मोह को सर्वथा दूर कर दिया है। मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के विषय में, तथा आपकी अविनाशी महिमा के विषय में भी विस्तार से सुना है। फिर भी, हे परमेश्वर, जैसा आपने अपना वर्णन किया है, मैं आपके उसी ऐश्वर्य-रूप को साक्षात् देखना चाहता हूँ। यदि आप यह सम्भव मानते हों कि मैं इसे देख सकूँ, तो हे योगेश्वर, कृपया मुझे अपना वह अविनाशी स्वरूप दिखाइए।
श्रीकृष्ण ने कहा कि हे पार्थ, अब मेरे सैकड़ों-हजारों, नाना प्रकार के, दिव्य, विविध वर्णों तथा आकृतियों वाले रूपों को देखो। आदित्यों को, वसुओं को, रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को, तथा मरुद्गणों को भी देखो — हे भारत, ऐसे अनेक अद्भुत आश्चर्य देखो, जो पहले कभी नहीं देखे गए। हे गुडाकेश, अब इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को, एक साथ, मेरे इस शरीर में स्थित देखो, तथा और भी जो कुछ तुम देखना चाहो, वह भी देख लो। किंतु तुम मुझे अपनी इन्हीं भौतिक आँखों से नहीं देख सकते — इसलिए मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ; अब मेरे इस ऐश्वर्यमय योग को देखो।
संजय ने आगे वर्णन किया कि इतना कहकर, हे राजन्, महायोगेश्वर हरि ने पार्थ को अपना वह परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया — अनेक मुखों और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दृश्यों से युक्त, अनेक दिव्य आभूषणों से सुसज्जित, तथा अनेक दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए। दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य सुगन्ध से अनुलिप्त, समस्त आश्चर्यों से परिपूर्ण, तेजस्वी, अनंत, तथा चारों ओर मुख वाला वह विराट स्वरूप — यदि आकाश में सहस्रों सूर्यों का प्रकाश एक साथ प्रकट हो जाए, तो भी वह उस महान पुरुष के तेज की तुलना में शायद ही आ सके।
उस देवाधिदेव के शरीर में, पाण्डव अर्जुन ने उस क्षण, अनेक भागों में विभक्त, इस सम्पूर्ण जगत् को एक ही स्थान पर संकलित देखा। तब धनञ्जय, विस्मय से अभिभूत होकर, रोमांचित होकर, अपना सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर, उस परमात्मा से इस प्रकार बोले — हे देव, मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं को, तथा नाना प्रकार के प्राणी-समूहों को देख रहा हूँ — कमलासन पर विराजमान ब्रह्मा को, समस्त ऋषियों को, तथा दिव्य सर्पों को भी। मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों तथा नेत्रों से युक्त, चारों ओर अनंत रूप में देख रहा हूँ — हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मुझे आपका न कोई अंत दिखाई देता है, न मध्य, और न ही आदि। मैं आपको मुकुट, गदा तथा चक्र धारण किए हुए देख रहा हूँ — सब ओर से प्रकाशित, देखने में अत्यंत कठिन, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान चारों ओर दहकते हुए, तथा अप्रमेय।
अर्जुन ने आगे कहा — आप अक्षर हैं, परम ज्ञातव्य हैं, इस जगत् के परम आश्रय हैं, तथा सनातन धर्म के अविनाशी रक्षक हैं — मैं मानता हूँ कि आप ही वह सनातन पुरुष हैं। मैं आपको आदि, मध्य तथा अंत से रहित, अनंत सामर्थ्य वाला, अगणित भुजाओं वाला देख रहा हूँ — सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, तथा आपका मुख प्रज्वलित अग्नि के समान, इस सम्पूर्ण जगत् को अपने ही तेज से तपाता हुआ है। आकाश और पृथ्वी के मध्य का यह सम्पूर्ण अंतराल, तथा समस्त दिशाएँ, केवल आपसे ही व्याप्त हैं — आपके इस अद्भुत, भयंकर रूप को देखकर, हे महात्मन्, तीनों लोक काँप रहे हैं। ये देवताओं के समूह, आपमें प्रवेश कर रहे हैं — कुछ भयभीत होकर, हाथ जोड़कर आपकी स्तुति गा रहे हैं; महर्षियों और सिद्धों के समूह, "शांति हो, शांति हो" कहते हुए, विपुल स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।
अर्जुन ने आगे कहा कि रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितरगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धों के समूह — ये सभी आपकी ओर देखकर विस्मित हो रहे हैं। हे महाबाहु, आपके इस विशाल रूप को, अनेक मुखों-नेत्रों से युक्त, अनेक भुजाओं, जंघाओं और चरणों से युक्त, अनेक उदरों तथा भयंकर दाढ़ों से युक्त देखकर, समस्त लोक काँप रहे हैं, तथा मैं भी काँप रहा हूँ। हे विष्णु, आपको आकाश का स्पर्श करते हुए, अनेक वर्णों से प्रज्वलित, विशाल फैले हुए मुखों वाला, तथा विशाल जलती हुई आँखों वाला देखकर, मेरा अन्तःकरण काँप उठा है, और मुझे न तो धैर्य मिल रहा है, न ही शांति। आपके कालाग्नि के समान भयंकर, दाढ़ों वाले मुखों को देखकर, मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रह गया, और न ही मुझे कोई शांति मिल रही है — हे देवेश, हे जगन्निवास, मुझ पर प्रसन्न होइए!
तत्पश्चात् अर्जुन ने वह अत्यंत भयावह दृश्य भी वर्णित किया, जो इस अध्याय का सर्वाधिक रोमांचकारी अंश है — धृतराष्ट्र के वे समस्त पुत्र, राजाओं के समूहों सहित, तथा भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र कर्ण भी, हमारे प्रमुख योद्धाओं के साथ, आपके भयंकर, दाढ़ों वाले मुखों में अत्यंत वेग से प्रवेश कर रहे हैं — कुछ तो आपके दाँतों के बीच, अपने चूर्ण किए हुए सिरों सहित, फँसे हुए भी दिखाई दे रहे हैं। जिस प्रकार नदियों की अनेक धाराएँ, वेगपूर्वक केवल समुद्र की ओर ही प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार ये संसार के वीर पुरुष भी, आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। जिस प्रकार पतंगे, अपने ही विनाश के लिए, बढ़ते हुए वेग से प्रज्वलित अग्नि में गिरते हैं, उसी प्रकार ये लोग भी, अपने ही विनाश के लिए, अत्यंत वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। आप अपने प्रज्वलित मुखों से इन समस्त लोकों को चारों ओर से निगलते हुए, बारम्बार चाट रहे हैं — हे विष्णु, आपका यह उग्र तेज, अपनी प्रभा से इस सम्पूर्ण जगत् को भरकर, इसे दग्ध कर रहा है।
भयभीत अर्जुन ने अंततः पूछा — मुझे बताइए, इस प्रकार के उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, मुझ पर प्रसन्न होइए! मैं आपको, इस आदि रूप में, जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को समझ नहीं पा रहा हूँ। इस पर श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत गम्भीर, विश्वप्रसिद्ध उत्तर दिया — मैं लोकों का नाश करने वाला, प्रबल काल हूँ, इस समय इन लोकों के संहार में प्रवृत्त हूँ; तुम्हारे बिना भी, इस विपक्षी सेना में खड़े ये समस्त योद्धा, नष्ट हो ही जाएँगे। इसलिए, हे अर्जुन, तुम उठो, और यश प्राप्त करो — शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके, इस समृद्ध राज्य का उपभोग करो; इन्हें तो मैंने पहले ही मार डाला है, हे सव्यसाचिन्, तुम तो केवल निमित्त-मात्र बन जाओ। द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण, तथा अन्य महारथी वीरों को भी, जिन्हें मैंने पहले ही मार डाला है, तुम निःसंकोच होकर युद्ध में मारो — शोक मत करो, युद्ध करो! तुम निश्चय ही रणभूमि में विजयी होगे।
संजय ने आगे बताया कि केशव के इस वचन को सुनकर, मुकुटधारी अर्जुन, काँपते हुए, हाथ जोड़कर, पुनः प्रणाम करके, अत्यंत भयभीत होकर, गद्गद वाणी में, नमस्कार करते हुए श्रीकृष्ण से पुनः बोले। अर्जुन ने कहा कि हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि सम्पूर्ण संसार आपके गुणगान में हर्षित और अनुरक्त हो रहा है — राक्षसगण भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं, तथा सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं। और वे ऐसा क्यों न करें, हे महात्मन् — आप तो आदि स्रष्टा ब्रह्मा से भी महान हैं; हे अनंत, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप ही अक्षर हैं, सत् भी आप ही हैं, असत् भी आप ही हैं, तथा जो इन दोनों से भी परे है, वह भी आप ही हैं।
अर्जुन ने आगे कहा — आप ही आदिदेव हैं, पुरातन पुरुष हैं, इस जगत् के परम आश्रय हैं; आप ही ज्ञाता हैं, ज्ञेय हैं, तथा परम धाम भी हैं — हे अनंतरूप, आपसे ही यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। आप ही वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चन्द्रमा हैं; आप ही प्रजापति हैं, तथा प्रपितामह भी हैं — आपको बारम्बार, सहस्रों बार नमस्कार है, नमस्कार है! आगे से भी नमस्कार, पीछे से भी नमस्कार, तथा हे सर्वात्मन्, सभी ओर से आपको नमस्कार है — आप अनंत बल तथा अपरिमित पराक्रम वाले हैं, आप सबमें व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
अर्जुन ने अत्यंत विनम्रता से आगे कहा कि यदि मैंने आपको सखा समझकर, आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद अथवा स्नेहवश "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे" कहकर सम्बोधित किया हो, तथा यदि हास-परिहास में, विश्राम करते, बैठे अथवा भोजन करते समय, अकेले में अथवा अन्य लोगों के समक्ष भी, आपका कोई अपमान किया हो, तो हे अच्युत, मैं उसके लिए आपसे क्षमा-याचना करता हूँ। आप ही इस चराचर जगत् के पिता हैं, पूजनीय हैं, तथा गुरुओं से भी बढ़कर गुरु हैं — आपके समान कोई नहीं है, फिर आपसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है, हे अतुल पराक्रम वाले! अतः प्रणाम करके, अपने शरीर को प्रणत करके, मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ — जिस प्रकार पिता पुत्र के, सखा सखा के, तथा प्रियतम प्रिया के अपराध को क्षमा करता है, उसी प्रकार आप भी मुझे क्षमा करें, हे देव।
अर्जुन ने अंत में विनम्रतापूर्वक कहा कि इस अद्भुत, अपूर्व दृश्य को देखकर मैं हर्षित हूँ, किंतु मेरा मन भय से भी अत्यंत व्याकुल है — हे देव, कृपया मुझे अपना वही सौम्य, चतुर्भुज रूप पुनः दिखाइए। मैं आपको पुनः उसी रूप में देखना चाहता हूँ, जिसमें आप मुकुट, गदा तथा चक्र धारण किए हुए हों — हे सहस्रबाहो, हे विश्वरूप, कृपया वही रूप पुनः धारण कीजिए। श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन, अपनी ही योगशक्ति से, तुम पर अनुकम्पा करते हुए, मैंने तुम्हें यह परम, तेजोमय, आदि, अनंत, विश्वरूप दिखाया है, जिसे तुम्हारे अतिरिक्त इससे पहले किसी ने नहीं देखा। हे कुरुश्रेष्ठ, न तो वेदों से, न तप से, न दान से, तथा न ही यज्ञ से, मुझे इस प्रकार, जैसे तुमने अभी देखा है, इस मनुष्य-लोक में देखा जा सकता है। इस मेरे भयंकर रूप को देखकर तुम भयभीत और मोहित मत हो — निर्भय होकर, प्रसन्न-चित्त होकर, अब पुनः मेरा वही पूर्व रूप देखो।
संजय ने बताया कि इस प्रकार अर्जुन से कहकर, वासुदेव ने पुनः अपना वही सौम्य रूप प्रकट किया, तथा उस महात्मा ने, अपना वह शांत रूप पुनः धारण करके, उस भयभीत अर्जुन को सांत्वना दी। अर्जुन ने कहा कि हे जनार्दन, आपके इस सौम्य, मानवीय रूप को देखकर, अब मैं स्वस्थ-चित्त हो गया हूँ, तथा अपनी सामान्य प्रकृति को पुनः प्राप्त कर चुका हूँ। श्रीकृष्ण ने अंत में कहा कि जिस रूप को तुमने देखा है, वह अत्यंत दुर्लभ है — देवता भी सदा इसी रूप के दर्शन की कामना करते रहते हैं। न वेदों से, न तप से, न दान से, तथा न ही यज्ञ से, मुझे इस रूप में देखा जा सकता है — किंतु हे परन्तप, केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही, इस रूप में मुझे यथार्थतः जाना जा सकता है, देखा जा सकता है, तथा प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति केवल मेरे ही निमित्त समस्त कर्म करता है, जो मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है, तथा समस्त प्राणियों के प्रति वैर-भाव से रहित है, वही, हे पाण्डव, मुझे प्राप्त होता है। इस प्रकार, एकादश अध्याय में, अर्जुन को प्राप्त हुआ वह विश्वरूप-दर्शन, गीता का सबसे भव्य, सबसे रोमांचकारी क्षण है — जिसमें एक ओर सृष्टि का सम्पूर्ण वैभव तथा विनाश, एक साथ साक्षात् हो उठता है, वहीं दूसरी ओर यह भी सिद्ध होता है कि इस अनंत, भयावह ऐश्वर्य तक पहुँचने का सरलतम मार्ग, अंततः वही निष्कपट, अनन्य भक्ति ही है, जिसे कोई भी साधारण मनुष्य अपने हृदय में धारण कर सकता है।
