अध्याय १२

भक्ति योग

एकादश अध्याय में उस भयावह, किंतु परम भव्य विश्वरूप-दर्शन के पश्चात्, तथा श्रीकृष्ण के अपने सौम्य रूप में पुनः लौट आने के बाद, अर्जुन का मन एक नई, अत्यंत व्यावहारिक जिज्ञासा से भर उठा। उन्होंने विनम्रतापूर्वक पूछा कि जो भक्त, इस प्रकार निरन्तर युक्त होकर, आपकी उपासना करते हैं, तथा जो साधक अक्षर, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं — इन दोनों में से, योग का श्रेष्ठतम ज्ञान किसके पास है? श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि जो भक्त, अपने मन को मुझमें ही स्थिर करके, नित्य-युक्त होकर, तथा परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मैं योग में सर्वाधिक सिद्ध मानता हूँ। किंतु जो साधक, उस अक्षर, अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल तथा नित्य तत्त्व की उपासना करते हैं — समस्त इन्द्रियों को संयमित करके, सर्वत्र समबुद्धि रखते हुए, तथा समस्त प्राणियों के कल्याण में रत रहते हुए — वे भी अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि अव्यक्त में मन लगाने वालों को कहीं अधिक कष्ट सहना पड़ता है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की उस गति को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। किंतु जो साधक, समस्त कर्मों को मुझे ही अर्पित करके, मुझे ही परम मानकर, तथा अनन्य योग के द्वारा मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं — हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर है, ऐसे भक्तों का, मैं शीघ्र ही, इस मृत्युरूपी संसार-सागर से उद्धारकर्ता बन जाता हूँ। अर्जुन का यह प्रश्न, विश्वरूप-दर्शन के उस विस्मयकारी अनुभव के तुरन्त पश्चात् उठा था, इसलिए इसका एक विशेष महत्व भी था। उस भयावह, विराट दर्शन के बाद, अर्जुन के मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा उठी होगी कि क्या परमात्मा तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग वही अमूर्त, निराकार ब्रह्म-चिन्तन है, जिसे समझना इतना कठिन प्रतीत होता है, अथवा क्या उस सौम्य, सगुण रूप की भक्ति भी उतनी ही प्रभावशाली है, जिसे उन्होंने अभी-अभी प्रत्यक्ष अनुभव किया था। श्रीकृष्ण ने इसका उत्तर देते हुए, इन दोनों मार्गों के बीच के भेद को बड़ी सहजता से स्पष्ट किया। यह सुनकर, अर्जुन के मन में यह भी स्वाभाविक चिंता उठी कि यदि मन को इस प्रकार पूर्णतः स्थिर करना इतना कठिन है, तो एक सामान्य साधक इस मार्ग पर किस प्रकार आगे बढ़े? इसी संभावित प्रश्न का उत्तर देते हुए, श्रीकृष्ण ने अत्यंत करुणापूर्वक, साधना का एक क्रमिक, सुलभ मार्ग प्रस्तुत किया, जो इस अध्याय की सबसे व्यावहारिक तथा सर्वाधिक प्रिय शिक्षा मानी जाती है। उन्होंने कहा कि अपने मन को केवल मुझमें ही स्थिर करो, अपनी बुद्धि को मुझमें ही लगाओ — इसके पश्चात् तुम निःसंदेह मुझमें ही निवास करोगे। यदि तुम अपने मन को इस प्रकार दृढ़तापूर्वक मुझमें स्थिर करने में असमर्थ हो, तो हे धनञ्जय, अभ्यास-योग के द्वारा मुझे प्राप्त करने का प्रयत्न करो। श्रीकृष्ण ने इस साधना-मार्ग को समझाने के लिए एक अत्यंत सरल उदाहरण भी दिया — जिस प्रकार एक बालक, जिसने अभी-अभी चलना सीखा है, पहले किसी सहारे को पकड़कर चलता है, फिर धीरे-धीरे उस सहारे के बिना ही चलने में सक्षम हो जाता है, उसी प्रकार साधक भी, आरम्भ में अभ्यास के सहारे की आवश्यकता अनुभव करता है, किंतु निरन्तर अभ्यास से, कालांतर में उसका मन स्वतः ही परमात्मा में स्थिर होने लगता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने किसी भी साधक को यह कहकर कभी निराश नहीं किया कि उसकी वर्तमान क्षमता अपर्याप्त है — अपितु उन्होंने प्रत्येक स्तर के लिए, एक न एक सुलभ द्वार अवश्य खुला रखा। यदि तुम इस अभ्यास को भी करने में असमर्थ हो, तो केवल मेरे ही निमित्त कर्म करने में तत्पर हो जाओ — मेरे लिए कर्म करते हुए भी, तुम सिद्धि को प्राप्त कर लोगे। और यदि तुम यह भी करने में असमर्थ हो, तो मेरे योग की शरण लेकर, आत्म-संयमपूर्वक, समस्त कर्मों के फल का त्याग कर दो। श्रीकृष्ण ने इस क्रमिक साधना-पद्धति का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि केवल अभ्यास की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से भी ध्यान श्रेष्ठ है, तथा ध्यान से भी कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है — क्योंकि इस त्याग के तुरन्त पश्चात् ही शांति प्राप्त होती है। अर्जुन के मन में यह विचार भी उठा होगा कि यह सब जानने के पश्चात्, एक सच्चे भक्त को पहचानने का व्यावहारिक लक्षण क्या है — मानो इसी अनकहे प्रश्न को भाँपते हुए, श्रीकृष्ण ने आगे उस अत्यंत सुंदर, विस्तृत सूची का वर्णन किया, जिसमें उन्होंने अपने प्रिय भक्त के गुणों का चित्रण किया है, और जो इस अध्याय का हृदय है। उन्होंने कहा कि जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो मैत्रीपूर्ण तथा करुणामय है, जो ममता और अहंकार से रहित है, जो सुख-दुःख में समभाव रखता है, तथा जो क्षमाशील है — तथा जो योगी सदा संतुष्ट रहता है, आत्म-संयमी है, दृढ़ निश्चय वाला है, तथा मन और बुद्धि जिसने मुझे ही अर्पित कर दी है, ऐसा मेरा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है। इस सूची में वर्णित प्रत्येक गुण, वास्तव में उन्हीं शिक्षाओं का प्रत्यक्ष प्रतिफल है, जो श्रीकृष्ण पूर्व के अध्यायों में पहले ही दे चुके थे — समभाव, आसक्ति-रहित कर्म, तथा आत्म-संयम, ये सभी सिद्धांत, अब एक जीवंत, सजीव व्यक्तित्व के रूप में, इस आदर्श भक्त के चित्रण में साकार होते दिखाई देते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि जिससे संसार भयभीत नहीं होता, तथा जो स्वयं भी संसार से भयभीत नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय तथा उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझे प्रिय है। जो आशा-रहित है, शुद्ध है, कुशल है, उदासीन है, व्यथा-रहित है, तथा जिसने समस्त कर्मों के आरम्भ का त्याग कर दिया है, ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो न तो हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा जिसने शुभ और अशुभ दोनों का त्याग कर दिया है, ऐसा भक्तियुक्त पुरुष मुझे प्रिय है। जो मित्र और शत्रु में समान भाव रखता है, तथा मान-अपमान में भी समान रहता है, जो शीत-उष्ण तथा सुख-दुःख में समान रहता है, तथा जो आसक्ति-रहित है — ऐसा व्यक्ति भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसी क्रम में, श्रीकृष्ण ने यह भी संकेत दिया कि ऐसा भक्त, संसार में रहते हुए भी, संसार से मानो अछूता ही रहता है — न वह किसी से भयभीत होता है, और न ही उसकी उपस्थिति से कोई अन्य भयभीत होता है। यह अवस्था, किसी कठोर तपस्या अथवा संसार-त्याग से नहीं, अपितु मन की उस गहन स्थिरता से प्राप्त होती है, जो निरन्तर अभ्यास और श्रद्धा से ही विकसित होती है। ऐसा व्यक्ति, चाहे राजमहल में रहे अथवा वन में, चाहे धनवान हो अथवा निर्धन, उसकी आन्तरिक शांति में कोई अंतर नहीं आता — क्योंकि उसकी प्रसन्नता, किसी बाहरी परिस्थिति पर नहीं, अपितु उसके अपने ही आत्म-बोध पर निर्भर करती है। श्रीकृष्ण ने इस भक्त-लक्षण के वर्णन को समाप्त करते हुए कहा कि जिसके लिए निंदा और स्तुति समान हैं, जो मौन रहता है, जो जो कुछ भी मिल जाए उसी में संतुष्ट रहता है, जिसका कोई निश्चित निवास-स्थान नहीं है, तथा जो स्थिर-बुद्धि है, तथा भक्तियुक्त है — ऐसा पुरुष मुझे प्रिय है। किंतु जो श्रद्धावान भक्त, इस प्रकार वर्णित इस धर्मामृत का पान करते हुए, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर मेरी उपासना करते हैं, वे मुझे अत्यंत, अत्यंत ही प्रिय हैं। इस पूरे उपदेश को सुनते हुए, अर्जुन को यह भी स्पष्ट हो गया कि भक्ति-योग, किसी भी प्रकार से ज्ञान-योग अथवा कर्मयोग से पृथक् अथवा उनसे निम्न मार्ग नहीं है, अपितु यह उन दोनों को ही अपने भीतर समाहित कर लेता है — क्योंकि जो व्यक्ति सच्चे अर्थों में भक्त है, वह स्वाभाविक रूप से ही समदर्शी ज्ञानी भी होगा, तथा निष्काम कर्मयोगी भी। यही कारण है कि आगे चलकर भारतीय भक्ति-परम्परा में, भक्ति को केवल भावुकता का मार्ग नहीं, अपितु ज्ञान और कर्म, दोनों की परिणति मानने वाला, एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन माना गया। इस अध्याय की एक विशेष विशेषता यह भी है कि यहाँ श्रीकृष्ण ने साधना के किसी एक ही मार्ग को सर्वोपरि नहीं ठहराया, अपितु उन्होंने प्रत्येक साधक की भिन्न-भिन्न क्षमता को भी भलीभाँति समझा। जिस प्रकार एक कुशल वैद्य, प्रत्येक रोगी की प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न औषधि सुझाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी, जो साधक सीधे मन को स्थिर नहीं कर पाता, उसके लिए अभ्यास का मार्ग सुझाया; जो अभ्यास भी नहीं कर पाता, उसके लिए निष्काम कर्म का मार्ग सुझाया; तथा जो यह भी नहीं कर पाता, उसके लिए भी फल-त्याग का सरलतम मार्ग खुला रखा। यही करुणा, इस अध्याय को अत्यंत मानवीय तथा सुलभ बनाती है — क्योंकि यहाँ किसी भी साधक को, चाहे वह जिस भी स्तर पर हो, निराश होने की आवश्यकता नहीं है। श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित भक्त के इन गुणों पर यदि गहराई से विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इनमें से अधिकांश गुण, किसी विशेष कर्मकाण्ड अथवा बाहरी आडंबर से सम्बन्धित नहीं हैं, अपितु ये सभी गुण मनुष्य के हृदय की आन्तरिक अवस्था से सम्बन्धित हैं — द्वेष-रहित होना, समता रखना, क्षमाशील होना, तथा निंदा-स्तुति में समान रहना — ये सभी गुण, किसी भी साधारण गृहस्थ के लिए भी, अपने दैनिक जीवन में ही विकसित किए जा सकते हैं, बिना संसार त्यागे। इसी कारण, भक्ति-योग को गीता के समस्त योगों में सर्वाधिक सुलभ तथा सार्वभौमिक मार्ग माना जाता है — यह न तो किसी विशेष जाति, वर्ण अथवा आश्रम तक सीमित है, और न ही किसी विशेष बौद्धिक क्षमता तक। इस प्रकार, द्वादश अध्याय में, श्रीकृष्ण भक्ति-योग की उस पूर्ण, क्रमिक तथा करुणामय व्याख्या के साथ, अपने आदर्श भक्त का वह चित्र प्रस्तुत करते हैं, जो समता, करुणा तथा निष्कामता से परिपूर्ण होकर, अंततः उस परम प्रेम को प्राप्त करता है, जिसकी घोषणा स्वयं परमात्मा ने की है — "वह मुझे अत्यंत प्रिय है।"