द्वादश अध्याय में भक्ति-योग के उस करुणामय उपदेश के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के उस भाग की ओर उन्मुख किया, जिसमें दर्शन की गहनतम परतें खुलने वाली थीं। उन्होंने स्वयं ही आरम्भ करते हुए कहा कि हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर ही क्षेत्र कहलाता है, तथा जो इसे जानता है, उसे ज्ञानीजन क्षेत्रज्ञ कहते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे यह गहन रहस्य भी प्रकट किया कि हे भारत, मुझे भी समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ ही जानो — तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह ज्ञान ही, मेरे मतानुसार, सच्चा ज्ञान है। उन्होंने कहा कि वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें क्या-क्या विकार होते हैं, वह किससे उत्पन्न होता है, वह क्षेत्रज्ञ कौन है, तथा उसका प्रभाव क्या है — यह सब, संक्षेप में, मुझसे सुनो।
श्रीकृष्ण ने बताया कि इस विषय का वर्णन ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से, पृथक्-पृथक् छंदों में, तथा ब्रह्मसूत्रों के सुनिश्चित, युक्तियुक्त पदों में भी किया गया है। उन्होंने आगे क्षेत्र के तत्त्वों का विस्तृत वर्णन किया — पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (मूल प्रकृति), दस इन्द्रियाँ तथा एक मन, तथा पाँच इन्द्रिय-विषय। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर का समुदाय, चेतना तथा धृति — यह सब, विकारों सहित, संक्षेप में क्षेत्र कहा गया है।
अर्जुन को यह सुनकर कुछ आश्चर्य हुआ, क्योंकि अब तक उन्होंने शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानकर, उसके सुख-दुःख, विजय-पराजय, तथा जीवन-मरण को ही सर्वोपरि महत्व दिया था। किंतु श्रीकृष्ण के इस नए दृष्टिकोण ने उन्हें यह सोचने पर विवश कर दिया कि यदि वे स्वयं केवल क्षेत्रज्ञ हैं, और यह शरीर केवल एक क्षेत्र-मात्र है, तो फिर युद्धभूमि में होने वाली यह हानि-लाभ, जय-पराजय की समस्त चिंता, वस्तुतः कितनी गौण हो जाती है। यही तो वह दृष्टिकोण था, जिसकी नींव श्रीकृष्ण आरम्भ से ही, धीरे-धीरे, अर्जुन के मन में डालते आ रहे थे।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने ज्ञान के उन गुणों का वर्णन किया, जो इस अध्याय का अत्यंत व्यावहारिक, मूल्यवान अंश है — अमानित्व (निरभिमानता), अदम्भित्व (निष्कपटता), अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, पवित्रता, स्थिरता, आत्म-संयम। इन्द्रिय-विषयों के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख में निहित दोषों का बार-बार अनुचिन्तन। अनासक्ति, पुत्र, पत्नी तथा घर आदि के प्रति ममत्व-रहित भाव, तथा अनुकूल एवं प्रतिकूल घटनाओं में भी निरन्तर समचित्तता। मुझमें अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्त स्थान का सेवन, तथा जन-समुदाय में अरुचि।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि अध्यात्म-ज्ञान में निरन्तरता, तथा तत्त्वज्ञान के प्रयोजन का सम्यक् दर्शन — इसी को ज्ञान कहा गया है, तथा जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है। इसके पश्चात् उन्होंने उस परम ज्ञातव्य तत्त्व का भी वर्णन किया, जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त होता है — वह अनादि परब्रह्म, जिसे न तो सत् कहा जा सकता है, और न ही असत्। उसके हाथ और पैर सर्वत्र हैं, उसकी आँखें, सिर तथा मुख भी सर्वत्र हैं, तथा उसके कान भी इस संसार में सर्वत्र विद्यमान हैं — वह समस्त को व्याप्त करके स्थित है।
श्रीकृष्ण ने उस परम तत्त्व के इस विरोधाभासी, किंतु अत्यंत गहन स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि वह समस्त इन्द्रियों के गुणों से प्रकाशित होते हुए भी, स्वयं इन्द्रियों से रहित है; वह अनासक्त होते हुए भी, सबका भरण-पोषण करने वाला है; वह गुण-रहित होते हुए भी, गुणों का भोक्ता है। वह समस्त प्राणियों के बाहर तथा भीतर भी विद्यमान है, चर और अचर दोनों रूपों में भी — अपनी सूक्ष्मता के कारण, वह अविज्ञेय है; वह अत्यंत निकट भी है, और अत्यंत दूर भी। वह अविभक्त होते हुए भी, प्राणियों में मानो विभक्त होकर स्थित प्रतीत होता है — उसे प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला, संहार करने वाला, तथा उत्पन्न करने वाला भी जानो। वह समस्त ज्योतियों की भी ज्योति कहा गया है, जो अंधकार से परे है — वह ज्ञान है, ज्ञेय है, तथा ज्ञान का लक्ष्य भी है, जो समस्त हृदयों में स्थित है।
श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित इन ज्ञान-गुणों पर यदि ध्यानपूर्वक विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इनमें से अधिकांश गुण, वे ही हैं, जिनका उल्लेख वे पूर्व के अध्यायों में भी बार-बार कर चुके हैं — यह कोई नई सूची नहीं, अपितु उन्हीं शाश्वत सद्गुणों का, एक भिन्न सन्दर्भ में, पुनः स्मरण है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि गीता का सम्पूर्ण उपदेश, किसी खंडित, असम्बद्ध शिक्षाओं का संग्रह नहीं, अपितु एक ही केन्द्रीय सत्य के, भिन्न-भिन्न कोणों से किए गए, पुनरावर्ती विवेचन हैं।
इस प्रकार, क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षिप्त वर्णन करते हुए, श्रीकृष्ण ने कहा कि मेरा भक्त, इसे भलीभाँति समझकर, मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है। इसके पश्चात् उन्होंने प्रकृति और पुरुष के उस गहन भेद को भी स्पष्ट किया, जो इस अध्याय का दूसरा मूल स्तम्भ है — प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि जानो, तथा यह भी जानो कि विकार और गुण, इन दोनों की उत्पत्ति प्रकृति से ही होती है। प्रकृति को कार्य और करण की उत्पत्ति का हेतु कहा गया है, जबकि पुरुष को सुख-दुःखों के भोग का हेतु कहा गया है।
श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि प्रकृति में स्थित पुरुष, प्रकृति से उत्पन्न गुणों का भोग करता है — इन्हीं गुणों के प्रति आसक्ति ही, उसके शुभ और अशुभ योनियों में जन्म का कारण बनती है। इस शरीर में स्थित परमात्मा को ही उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर, तथा परमात्मा भी कहा जाता है। जो व्यक्ति पुरुष और प्रकृति को, गुणों सहित, इस प्रकार जान लेता है, वह चाहे जैसे भी जीवन व्यतीत करे, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने प्रकृति और पुरुष के इस भेद को समझाने के लिए एक अत्यंत सरल उदाहरण भी दिया — जिस प्रकार एक रंगमंच पर अभिनेता, भिन्न-भिन्न पात्रों की वेशभूषा धारण करके, उनके सुख-दुःख का अभिनय करता है, फिर भी वास्तव में वह स्वयं उन भूमिकाओं से पृथक् ही रहता है, उसी प्रकार पुरुष (चेतन आत्मा) भी, प्रकृति के इस रंगमंच पर, भिन्न-भिन्न शरीरों तथा परिस्थितियों का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में वह उनसे सर्वथा पृथक्, एक साक्षी-मात्र ही बना रहता है। यही भेद-ज्ञान, समस्त दुःखों से मुक्ति का मूल आधार माना गया है।
इसी ज्ञान को प्राप्त करने के भी विविध मार्ग हैं, यह बताते हुए श्रीकृष्ण ने कहा कि कुछ साधक, ध्यान के द्वारा, अपने ही भीतर आत्मा को आत्मा के द्वारा देखते हैं; कुछ सांख्य-योग (ज्ञान-मार्ग) के द्वारा, तथा कुछ कर्मयोग के द्वारा। इसके अतिरिक्त, कुछ अन्य लोग, जो इस मार्ग को स्वयं नहीं जानते, वे अन्य ज्ञानियों से सुनकर ही उपासना करते हैं — वे भी, उसी श्रवण के बल पर, मृत्यु को पार कर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने यहाँ यह भी स्पष्ट किया कि जो भी प्राणी उत्पन्न होता है, चर अथवा अचर, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के ही संयोग से उत्पन्न जानो, हे भरतश्रेष्ठ। जो व्यक्ति सम्पूर्ण प्राणियों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को, तथा नष्ट होते हुए प्राणियों में भी अविनाशी रूप से देखता है, वही वास्तव में देखता है।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि जो व्यक्ति सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह स्वयं अपनी ही आत्मा का हनन नहीं करता, तथा इस प्रकार वह परम गति को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति यह देखता है कि समस्त कर्म, सभी प्रकार से, केवल प्रकृति के द्वारा ही सम्पन्न किए जाते हैं, तथा आत्मा अकर्ता है, वही सम्यक् दृष्टि रखता है। जब मनुष्य प्राणियों की इस नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न स्थिति को, एक ही तत्त्व में स्थित, तथा उसी एक से विस्तृत देखता है, तभी वह ब्रह्म को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि यह परमात्मा, अविनाशी, अनादि तथा गुणरहित होने के कारण, हे कुन्तीपुत्र, शरीर में स्थित होते हुए भी, न तो कुछ करता है, न ही लिप्त होता है — जिस प्रकार सर्वव्यापी आकाश, अपनी सूक्ष्मता के कारण, कभी लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा भी कभी लिप्त नहीं होती। जिस प्रकार एक ही सूर्य, इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्री (आत्मा), सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है, हे भारत।
श्रीकृष्ण ने इस अध्याय के समापन की ओर बढ़ते हुए, एक बार पुनः इस बात पर बल दिया कि यह ज्ञान, चाहे कितना भी गहन क्यों न प्रतीत हो, इसका अंतिम प्रयोजन मनुष्य को संसार से विमुख करना नहीं, अपितु उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, एक गहरी आन्तरिक स्वतंत्रता प्रदान करना है। जो साधक यह भलीभाँति समझ लेता है कि वह स्वयं शरीर नहीं, अपितु उस शरीर का साक्षी है, वह युद्धभूमि में खड़े होकर भी, उसी शांति का अनुभव कर सकता है, जो एक वनवासी तपस्वी को प्राप्त होती है — क्योंकि सच्ची शांति, बाहरी परिस्थितियों में नहीं, अपितु इसी भेद-ज्ञान में निहित है।
अंत में श्रीकृष्ण ने कहा कि जो व्यक्ति, ज्ञान-चक्षु से, इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को, तथा प्रकृति से प्राणियों की मुक्ति को जान लेते हैं, वे परम तत्त्व को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार, त्रयोदश अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) तथा उसे जानने वाली चेतना (क्षेत्रज्ञ) के मध्य वह सूक्ष्म, किंतु अत्यंत मूलभूत भेद समझाते हैं, जो आगे के अध्यायों में प्रकृति के गुणों के विस्तृत विवेचन की नींव रखता है। वे यह सिद्ध करते हैं कि जब तक मनुष्य अपने शरीर, मन तथा बुद्धि को ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप मान बैठता है, तब तक वह प्रकृति के बन्धन में ही उलझा रहता है — किंतु जिस क्षण वह यह अनुभव कर लेता है कि वह स्वयं उस क्षेत्र से पृथक्, एक साक्षी-मात्र चेतना है, उसी क्षण से उसका मुक्ति की ओर वास्तविक मार्ग आरम्भ हो जाता है।
