त्रयोदश अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के उस गहन भेद को समझाने के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उस परम ज्ञान का पुनः वर्णन करने की इच्छा प्रकट की, जिसे जानकर अनेक मुनि, इस संसार से उस परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस ज्ञान की शरण लेकर, मेरे ही समान स्वभाव को प्राप्त करके, वे साधक, सृष्टि के समय भी पुनः जन्म नहीं लेते, तथा प्रलय के समय भी विचलित नहीं होते। श्रीकृष्ण ने आगे सृष्टि-रचना का वह गहन रहस्य भी प्रकट किया — महत् ब्रह्म (मूल प्रकृति) मेरी योनि है, जिसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ — हे भारत, उसी से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है। हे कुन्तीपुत्र, चाहे किसी भी योनि में, कोई भी रूप उत्पन्न हो, महत् ब्रह्म ही उनकी योनि है, तथा मैं ही बीज देने वाला पिता हूँ।
अर्जुन के लिए यह ज्ञान विशेष रूप से उपयोगी था, क्योंकि अब तक वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि एक ही परिस्थिति में, विभिन्न व्यक्ति इतनी भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया क्यों करते हैं — कोई व्यक्ति संकट में भी शांत रहता है, कोई उद्विग्न होकर कर्म में जुट जाता है, तथा कोई केवल आलस्य और निराशा में डूब जाता है। श्रीकृष्ण का यह गुण-विवेचन, वस्तुतः मानव-स्वभाव के इन्हीं भिन्न-भिन्न रूपों की एक गहन व्याख्या प्रस्तुत करता है, जिसके द्वारा साधक अपने ही भीतर उठने वाले भावों को पहचानकर, उन्हें उचित दिशा दे सकता है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उन तीन गुणों का विस्तृत वर्णन आरम्भ किया, जो इस अध्याय का मूल विषय है — सत्त्व, रज तथा तम — ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण, हे महाबाहु, इस अविनाशी देहधारी आत्मा को शरीर में बाँध लेते हैं। इनमें से सत्त्व, निर्मल होने के कारण, प्रकाशमान तथा निरामय है — यह सुख में आसक्ति और ज्ञान में आसक्ति के द्वारा बाँधता है, हे निष्पाप अर्जुन। रजोगुण को रागात्मक स्वभाव वाला, तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न जानो — यह, हे कुन्तीपुत्र, देहधारी को कर्म में आसक्ति के द्वारा बाँधता है। किंतु तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न, समस्त देहधारियों को मोहित करने वाला जानो — यह, हे भारत, प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा के द्वारा बाँधता है।
श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि सत्त्वगुण मनुष्य को सुख में आसक्त करता है, रजोगुण कर्म में, हे भारत — किंतु तमोगुण, ज्ञान को आच्छादित करके, प्रमाद में ही आसक्त करता है। रज और तम को दबाकर, सत्त्व प्रबल होता है, हे भारत; सत्त्व और तम को दबाकर, रज प्रबल होता है; तथा इसी प्रकार, सत्त्व और रज को दबाकर, तम प्रबल होता है। जब इस शरीर में, समस्त द्वारों से ज्ञान का प्रकाश उदित होता है, तब यह जानना चाहिए कि सत्त्वगुण की वृद्धि हो रही है। लोभ, प्रवृत्ति (सक्रियता), कर्मों का आरम्भ, अशांति, तथा लालसा — ये सब, हे भरतश्रेष्ठ, रजोगुण की वृद्धि होने पर उत्पन्न होते हैं। अंधकार, जड़ता, प्रमाद, तथा मोह — ये सब, हे कुरुनन्दन, तमोगुण की वृद्धि होने पर उत्पन्न होते हैं।
श्रीकृष्ण ने इन तीनों गुणों के पारस्परिक संघर्ष को भी एक अत्यंत सजीव चित्रण के द्वारा समझाया — उन्होंने बताया कि ये तीनों गुण, मनुष्य के मन में निरन्तर एक-दूसरे पर प्रभुत्व पाने का प्रयत्न करते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे आकाश में तीन भिन्न-भिन्न रंगों के बादल, कभी एक-दूसरे को ढक लेते हैं, तो कभी पीछे हट जाते हैं। यही कारण है कि एक ही व्यक्ति, दिन के भिन्न-भिन्न क्षणों में, कभी अत्यंत शांत तथा ज्ञानपूर्ण, कभी अत्यंत सक्रिय तथा महत्वाकांक्षी, तो कभी अत्यंत आलसी और उदासीन प्रतीत हो सकता है — यह सब, इन्हीं तीनों गुणों के उतार-चढ़ाव का ही परिणाम है। साधक का प्रथम कर्तव्य यही है कि वह अपने भीतर इन गुणों के इस खेल को पहचानना सीखे, ताकि वह धीरे-धीरे सत्त्वगुण की प्रधानता की ओर अपनी प्रवृत्ति को मोड़ सके।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने इन तीनों गुणों में मृत्यु होने पर, अगली गति का भी रहस्य बताया — यदि सत्त्व की वृद्धि के समय देहधारी की मृत्यु होती है, तो वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है। रजोगुण में मृत्यु होने पर, वह कर्मासक्त जनों के बीच जन्म लेता है; तथा तमोगुण में मृत्यु होने पर, वह मूढ़ योनियों में जन्म लेता है। सात्त्विक कर्म का फल निर्मल तथा शुद्ध कहा जाता है, रजोगुण का फल दुःख है, तथा तमोगुण का फल अज्ञान है। सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, तथा रज से लोभ उत्पन्न होता है — प्रमाद और मोह, तमोगुण से ही उत्पन्न होते हैं, तथा अज्ञान भी। सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं, रजोगुणी मध्य में निवास करते हैं, जबकि अंतिम, निकृष्ट गुण की वृत्ति में स्थित तामसिक जन, अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्रीकृष्ण ने आगे वह गहन रहस्य भी प्रकट किया, जो इस अध्याय के चरम का संकेत देता है — जब द्रष्टा, गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी कर्ता को नहीं देखता, तथा गुणों से भी परे, उस तत्त्व को जान लेता है, तब वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है। देहधारी, शरीर की उत्पत्ति के इन तीनों गुणों को पार करके, जन्म, मृत्यु, जरा तथा दुःख से मुक्त होकर, अमृतत्व को प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि यद्यपि सत्त्वगुण, रज और तम की अपेक्षा निःसंदेह श्रेष्ठ है, तथापि वह भी अंततः एक बन्धन ही है — क्योंकि सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति भी, ज्ञान और सुख के प्रति एक सूक्ष्म आसक्ति से बँधा रहता है। यही कारण है कि साधना का अंतिम लक्ष्य, केवल तमोगुण और रजोगुण से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में स्थित होना मात्र नहीं है, अपितु इन तीनों गुणों से ही सर्वथा ऊपर उठ जाना है — यह एक ऐसी अवस्था है, जिसमें साधक, न तो किसी गुण के प्रति आकर्षित होता है, और न ही किसी गुण से विकर्षित।
इस गहन उपदेश को सुनकर, अर्जुन ने अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न पूछा — हे प्रभु, इन तीनों गुणों से परे गए हुए व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? उसका आचरण कैसा होता है, तथा वह इन तीनों गुणों को किस प्रकार पार करता है? श्रीकृष्ण ने इसका उत्तर देते हुए उस आदर्श व्यक्तित्व का वर्णन किया, जो इस अध्याय का सबसे व्यावहारिक, सबसे स्मरणीय अंश है — जो व्यक्ति, प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज), तथा मोह (तम) के उत्पन्न होने पर उनसे द्वेष नहीं करता, और उनके शांत होने पर उनकी इच्छा भी नहीं करता। जो उदासीन के समान स्थित होकर, गुणों से विचलित नहीं होता; जो यह सोचकर कि "गुण ही अपनी क्रियाओं में प्रवृत्त हो रहे हैं," स्थिर रहता है, तथा कभी विचलित नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने इस गुणातीत पुरुष के लक्षणों का वर्णन करते समय, एक अत्यंत मार्मिक उपमा भी प्रस्तुत की — उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पर्वत की चोटी पर खड़ा व्यक्ति, नीचे घाटी में चलने वाली आँधी और वर्षा को देख तो सकता है, किंतु स्वयं उनसे अप्रभावित रहता है, उसी प्रकार गुणातीत पुरुष भी, अपने चारों ओर चलने वाले सुख-दुःख, मान-अपमान तथा लाभ-हानि के इस खेल को देखता तो है, किंतु स्वयं उससे सर्वथा अविचलित रहता है। जो सुख-दुःख में समान रहता है, जो अपनी ही आत्मा में स्थित रहता है, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर, तथा स्वर्ण समान हैं; जो प्रिय और अप्रिय में भी समान रहता है, जो स्थिरबुद्धि है, तथा जो अपनी निंदा और स्तुति को भी समान मानता है। जो मान और अपमान में समान रहता है, तथा मित्र और शत्रु के पक्ष में भी समान रहता है, जिसने समस्त कर्मों के आरम्भ का त्याग कर दिया है — उसे ही गुणातीत कहा जाता है। तथा जो व्यक्ति, अव्यभिचारिणी भक्ति-योग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके, ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य बन जाता है।
श्रीकृष्ण के इस वर्णन ने अर्जुन के मन में गुणातीत अवस्था की एक अत्यंत स्पष्ट, व्यावहारिक छवि अंकित कर दी — यह कोई दूरस्थ, अप्राप्य आदर्श नहीं, अपितु एक ऐसी मनःस्थिति है, जिसे कोई भी साधक, निरन्तर अभ्यास और भक्ति के द्वारा, धीरे-धीरे अपने भीतर विकसित कर सकता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने इस अवस्था को प्राप्त करने का साधन भी अत्यंत सुलभ बताया — न कोई जटिल कर्मकाण्ड, न कोई असाधारण तपस्या, अपितु केवल अव्यभिचारिणी भक्ति, जो किसी भी साधारण गृहस्थ के लिए भी सहज रूप से सुलभ है।
अंत में श्रीकृष्ण ने यह भी घोषित किया कि मैं ही अमृत और अविनाशी ब्रह्म का, सनातन धर्म का, तथा ऐकान्तिक (अनन्त) सुख का आश्रय हूँ। इस प्रकार, चतुर्दश अध्याय में, श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के इन तीनों गुणों — सत्त्व, रज तथा तम — का वह विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करते हैं, जो मनुष्य के समस्त स्वभाव, कर्म तथा गति को निर्धारित करते हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि जब तक मनुष्य इन गुणों के खेल में उलझा रहता है, तब तक वह बारम्बार बन्धन में ही पड़ा रहता है — किंतु जिस क्षण वह यह समझ लेता है कि वह स्वयं इन गुणों से परे, केवल एक साक्षी-मात्र है, उसी क्षण से वह इस त्रिगुणात्मक संसार के परे, उस शाश्वत, अमृतस्वरूप परब्रह्म की ओर अग्रसर होने लगता है।
