अध्याय १५

पुरुषोत्तम योग

चतुर्दश अध्याय में प्रकृति के तीनों गुणों के उस विस्तृत विवेचन के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक अत्यंत काव्यात्मक, रहस्यमय रूपक के माध्यम से, सृष्टि और मुक्ति के उस सम्पूर्ण रहस्य को समझाने का निश्चय किया। उन्होंने कहा कि ऋषिजन उस अविनाशी अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वर्णन करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं, तथा जिसके पत्ते वेद-मंत्र कहलाते हैं — जो इस वृक्ष को इस प्रकार जानता है, वही वास्तव में वेदों को जानता है। यह उलटा वृक्ष, वेदों में भी वर्णित एक अत्यंत प्राचीन, रहस्यमय प्रतीक है, जिसके द्वारा ऋषिजन इस सम्पूर्ण सृष्टि की संरचना को समझाने का प्रयत्न करते आए हैं। जिस प्रकार एक साधारण वृक्ष की जड़ें भूमि में छिपी रहती हैं, तथा उसकी शाखाएँ आकाश की ओर फैलती हैं, उसी प्रकार इस सृष्टि-वृक्ष का क्रम उलट दिया गया है — इसका मूल स्रोत, अर्थात् परब्रह्म, सबसे ऊपर, अदृश्य तथा अगम्य है, जबकि इसकी शाखाएँ, अर्थात् यह दृश्यमान संसार, नीचे की ओर फैली हुई, मनुष्यों को प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। श्रीकृष्ण ने इस वृक्ष का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि इसकी शाखाएँ, गुणों से पोषित होकर, ऊपर तथा नीचे की ओर फैली हुई हैं, तथा इन्द्रिय-विषय इसकी कोंपलें हैं; तथा नीचे, मनुष्य-लोक में, इसकी जड़ें भी फैली हुई हैं, जो कर्म से बन्धन उत्पन्न करती हैं। इस संसार में, इस वृक्ष का न तो ऐसा स्वरूप अनुभव किया जा सकता है, न इसका अंत, न इसकी आदि, और न ही इसकी नींव — वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से इस सुदृढ़-मूल अश्वत्थ वृक्ष को काटकर, फिर उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् पुनः लौटना नहीं पड़ता — यह सोचते हुए कि "मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह सनातन सृष्टि-प्रवाह उत्पन्न हुआ है।" इसी उपमा को और स्पष्ट करते हुए, श्रीकृष्ण ने यह भी संकेत दिया कि साधारण मनुष्य, इस वृक्ष की शाखाओं, पत्तों तथा फलों में इतना उलझ जाता है कि वह यह भूल ही जाता है कि इस समस्त विस्तार का कोई मूल स्रोत भी है। वह धन, सम्बन्ध, तथा सांसारिक सफलता को ही अंतिम लक्ष्य मान बैठता है, जबकि ये सब, वास्तव में उस वृक्ष की केवल कोंपलें और पत्तियाँ मात्र हैं। वैराग्य का शस्त्र, इसी भ्रम को काटने का साधन है — यह संसार का त्याग करने का आदेश नहीं, अपितु संसार के प्रति अनावश्यक आसक्ति को काटने का उपदेश है, ताकि साधक, शाखाओं से आगे बढ़कर, उस मूल स्रोत तक पहुँच सके। श्रीकृष्ण ने आगे उस परम पद को प्राप्त करने वालों के लक्षण भी बताए — मान और मोह से रहित, आसक्ति के दोष पर विजय प्राप्त किए हुए, नित्य आत्म-स्थित, कामनाओं से सर्वथा निवृत्त, तथा सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से मुक्त, ऐसे अमोहित साधक ही उस शाश्वत पद को प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि उस परम धाम को न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, और न ही अग्नि — वह मेरा परम धाम है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात् पुनः लौटना नहीं पड़ता। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने जीवात्मा के उस रहस्य को भी उद्घाटित किया, जो इस अध्याय का एक अत्यंत गहन अंश है — मेरा ही एक अंश, इस संसार में सनातन जीवात्मा बनकर, प्रकृति में स्थित इन्द्रियों को, मन सहित, अपनी ओर आकर्षित करता है। जब यह ईश्वर (जीवात्मा) किसी शरीर को प्राप्त करता है, तथा जब वह उससे प्रस्थान भी करता है, तब वह इन्हीं इन्द्रियों और मन को साथ लेकर जाता है, जिस प्रकार वायु, पुष्पों से सुगन्ध को ग्रहण करके आगे ले जाती है। श्रोत्र, नेत्र, स्पर्श, रस तथा गन्ध की इन्द्रियों पर, तथा मन पर भी अधिष्ठित होकर, वह इन्द्रिय-विषयों का भोग करता है। मूढ़ लोग, इस प्रस्थान करते, ठहरते, अथवा गुणों से युक्त होकर भोग करते हुए जीवात्मा को नहीं देख पाते — किंतु जिनके पास ज्ञान-चक्षु है, वे ही इसे देख पाते हैं। प्रयत्नशील योगी भी इसे अपने ही भीतर स्थित देखते हैं, किंतु जिनका अन्तःकरण अशुद्ध है, वे प्रयत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते। इस जीवात्मा के रहस्य को समझाने के लिए, श्रीकृष्ण ने वायु और सुगन्ध की वह उपमा विशेष रूप से इसलिए चुनी, क्योंकि यह अत्यंत सहजता से यह दर्शाती है कि जीवात्मा, शरीर से शरीर की यात्रा करते समय, अपने साथ कुछ भी स्थूल नहीं, अपितु केवल सूक्ष्म संस्कार और प्रवृत्तियाँ ही साथ लेकर जाती है — ठीक उसी प्रकार जैसे वायु, किसी पुष्प को अपने साथ नहीं ले जाती, अपितु केवल उसकी सुगन्ध को ही आगे प्रवाहित करती है। यही संस्कार, अगले जन्म में, मनुष्य की रुचियों, क्षमताओं तथा प्रवृत्तियों का निर्धारण करते हैं। श्रीकृष्ण ने आगे यह भी बताया कि सूर्य में स्थित जो तेज, इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, तथा चन्द्रमा में तथा अग्नि में भी जो तेज है, हे अर्जुन, उस तेज को मेरा ही तेज जानो। पृथ्वी में प्रवेश करके, मैं अपने ओज से समस्त प्राणियों का धारण-पोषण करता हूँ, तथा रसमय सोम (चन्द्रमा) बनकर, मैं समस्त ओषधियों को पोषित करता हूँ। प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर अग्नि बनकर, तथा प्राण और अपान से युक्त होकर, मैं ही चार प्रकार के अन्न का पाचन करता हूँ। मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ — मुझसे ही स्मृति, ज्ञान, तथा उनका अभाव भी उत्पन्न होता है; मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मैं ही वेदांत का रचयिता हूँ, तथा मैं ही वेद को जानने वाला भी हूँ। इस वर्णन ने अर्जुन को यह अनुभव कराया कि परमात्मा, किसी दूरस्थ, अलग-थलग सत्ता के रूप में नहीं, अपितु प्रतिदिन के जीवन के सबसे साधारण तत्त्वों में भी — भोजन के पाचन में, स्मृति के कार्य में, तथा सूर्य-चन्द्र के प्रकाश में भी — समान रूप से सक्रिय है। यही दृष्टिकोण, भक्ति को किसी विशेष समय अथवा स्थान तक सीमित न रखकर, जीवन के प्रत्येक क्षण तथा प्रत्येक क्रिया से जोड़ देता है — क्योंकि जब पाचन, श्वास तथा स्मृति जैसी अत्यंत साधारण प्रक्रियाएँ भी परमात्मा की ही अभिव्यक्ति मानी जाएँ, तो फिर जीवन का कौन-सा क्षण उनसे पृथक् रह जाता है? इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने इस अध्याय का वह परम रहस्य उद्घाटित किया, जो इसका नाम — पुरुषोत्तम योग — भी सार्थक करता है। उन्होंने कहा कि इस संसार में दो पुरुष हैं — क्षर (नश्वर) तथा अक्षर (अविनाशी)। समस्त प्राणी क्षर हैं, जबकि कूटस्थ (अपरिवर्तनशील साक्षी) को अक्षर कहा जाता है। किंतु इन दोनों से भी भिन्न, एक अन्य परम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है — वह अविनाशी ईश्वर, तीनों लोकों में प्रवेश करके, उन्हें धारण करता है। चूँकि मैं क्षर से परे हूँ, तथा अक्षर से भी श्रेष्ठ हूँ, इसी कारण लोक में तथा वेद में भी, मुझे पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध किया गया है। क्षर, अक्षर तथा पुरुषोत्तम के इस त्रिस्तरीय वर्गीकरण को समझाने के लिए, श्रीकृष्ण ने मानो एक सीढ़ी-सी प्रस्तुत की — सबसे निचले स्तर पर यह नश्वर, परिवर्तनशील संसार है, जिसमें समस्त प्राणी सम्मिलित हैं; इससे ऊपर वह अपरिवर्तनशील साक्षी-तत्त्व है, जो इस परिवर्तन को केवल देखता है, किंतु स्वयं अप्रभावित रहता है; तथा सबसे ऊपर, स्वयं पुरुषोत्तम हैं, जो इन दोनों को ही धारण किए हुए, इन दोनों से भी परे स्थित हैं। यह त्रिस्तरीय दृष्टिकोण, गीता के समस्त पूर्व उपदेशों को भी एक नए, समग्र परिप्रेक्ष्य में संकलित करता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि जो व्यक्ति, अमोहित होकर, मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ होकर, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से मेरी उपासना करता है, हे भारत। उन्होंने अंत में कहा कि हे निष्पाप अर्जुन, यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र, मेरे द्वारा तुम्हें बताया जा चुका है — इसे जानकर, मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है, तथा उसका सम्पूर्ण जीवन कृतकृत्य हो जाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त उलटे वृक्ष की यह उपमा, भारतीय दर्शन की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपमाओं में से एक मानी जाती है — यह सांसारिक जीवन के उस विरोधाभासी स्वभाव को अत्यंत सटीकता से चित्रित करती है, जिसमें मूल स्रोत ऊपर, अदृश्य तथा शाश्वत होते हुए भी, इसकी शाखाएँ, अर्थात् संसार के भोग्य-विषय, नीचे की ओर, दृश्यमान तथा क्षणभंगुर रूप में फैली हुई प्रतीत होती हैं। साधारण मनुष्य, इन्हीं दृश्यमान शाखाओं और उनके फलों में उलझकर, उस अदृश्य मूल स्रोत को पहचान ही नहीं पाता — जबकि ज्ञानी पुरुष, वैराग्य के शस्त्र से इसी भ्रमजाल को काटकर, सीधे उस मूल, अविनाशी पुरुष तक पहुँच जाता है, जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि-वृक्ष प्रस्फुटित हुआ है। इस प्रकार, पंचदश अध्याय में, श्रीकृष्ण, क्षर, अक्षर तथा पुरुषोत्तम के इस त्रिस्तरीय रहस्य को उद्घाटित करते हुए, यह सिद्ध करते हैं कि वे स्वयं, इन दोनों — नश्वर जगत् तथा अविनाशी साक्षी-तत्त्व — से भी परे, उस परम, सर्वोच्च सत्ता हैं, जो इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण किए हुए हैं।