पंचदश अध्याय में पुरुषोत्तम के उस परम रहस्य को उद्घाटित करने के पश्चात्, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक अत्यंत व्यावहारिक, नैतिक विवेचन की ओर उन्मुख किया, जो मनुष्य के दैनिक आचरण को सीधे प्रभावित करता है। उन्होंने उन सद्गुणों की एक विस्तृत सूची दी, जिन्हें दैवी सम्पदा कहा जाता है — निर्भयता, चित्त की शुद्धि, ज्ञान-योग में दृढ़ स्थिति, दान, आत्म-संयम, यज्ञ, शास्त्राध्ययन, तप तथा सरलता। अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, किसी की निंदा न करना, प्राणियों पर दया, अलोलुपता, कोमलता, लज्जा तथा चंचलता का अभाव। तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (पवित्रता), अद्रोह (किसी के प्रति द्वेष न रखना), तथा अत्यधिक मान का अभाव — हे भारत, ये समस्त गुण, दैवी सम्पदा लेकर जन्मे व्यक्ति के होते हैं।
इन गुणों की इस विस्तृत सूची को सुनकर, अर्जुन को यह अनुभव हुआ कि यह कोई दुर्लभ, असाधारण आदर्श नहीं है, अपितु ये वे ही सद्गुण हैं, जिन्हें प्रत्येक सभ्य समाज, प्रत्येक धर्म-परम्परा में सराहा जाता रहा है — निर्भयता, सत्य, करुणा, तथा क्षमा जैसे गुण, किसी एक विशेष सम्प्रदाय तक सीमित नहीं, अपितु मानव-स्वभाव की उस सार्वभौमिक उत्कृष्टता के प्रतीक हैं, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न प्रत्येक युग में, प्रत्येक संस्कृति में किया गया है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण इसे "दैवी सम्पदा" अर्थात् ईश्वरीय गुण कहते हैं — क्योंकि इनमें से प्रत्येक गुण, मनुष्य के भीतर स्थित उसी परमात्मा की प्रत्यक्ष झलक है।
इसके विपरीत, श्रीकृष्ण ने आसुरी सम्पदा के लक्षणों का भी वर्णन किया — दम्भ, अभिमान, अत्यधिक मान, क्रोध, कठोरता, तथा अज्ञान — ये सब, हे पार्थ, आसुरी सम्पदा लेकर जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए मानी गई है, जबकि आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी जाती है — हे पाण्डव, शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा लेकर ही जन्मे हो। उन्होंने आगे कहा कि इस संसार में दो प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं — दैवी तथा आसुरी; दैवी सम्पदा का विस्तृत वर्णन किया जा चुका है, अब हे पार्थ, आसुरी सम्पदा के विषय में भी मुझसे सुनो।
श्रीकृष्ण ने यहाँ अर्जुन को विशेष रूप से यह आश्वासन दिया कि तुम दैवी सम्पदा लेकर ही जन्मे हो — यह केवल एक सांत्वना-वचन नहीं था, अपितु एक गहन संकेत भी था कि अर्जुन का यह विषाद, जो युद्ध के आरम्भ में उत्पन्न हुआ था, वास्तव में उनकी करुणा और संवेदनशीलता का ही प्रमाण था, न कि किसी दुर्बलता का। श्रीकृष्ण ने आगे आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों के विषय में कहा कि वे न तो प्रवृत्ति को जानते हैं, और न ही निवृत्ति को — उनमें न तो पवित्रता है, न सदाचार है, और न ही सत्य। वे कहते हैं कि यह जगत् सत्यरहित है, आधाररहित है, ईश्वर-रहित है, तथा परस्पर कार्य-कारण भाव से रहित है — फिर यह सब केवल काम (वासना) से ही उत्पन्न हुआ है, और क्या हो सकता है? इसी दृष्टिकोण को पकड़कर, अल्पबुद्धि, क्रूरकर्मी, ये नष्टप्राय आत्माएँ, संसार के विनाश के लिए, शत्रु के रूप में उठ खड़ी होती हैं।
श्रीकृष्ण ने आगे इनके स्वभाव का और भी गहन वर्णन किया — अतृप्त कामनाओं के वशीभूत, दम्भ, मान तथा मद से परिपूर्ण, मोहवश मिथ्या सिद्धांतों को धारण किए हुए, वे अशुद्ध संकल्प के साथ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। मृत्यु-पर्यंत रहने वाली असंख्य चिंताओं से घिरे, विषय-भोग को ही परम लक्ष्य मानते हुए, तथा यह दृढ़ विश्वास रखते हुए कि "बस यही सब कुछ है," वे सैकड़ों आशा-पाशों में बँधे, काम और क्रोध के अधीन होकर, अन्यायपूर्ण उपायों से धन-संग्रह करने का प्रयत्न करते हैं।
उनके मन की यह दशा भी श्रीकृष्ण ने अत्यंत मार्मिक ढंग से वर्णित की — "आज मुझे यह प्राप्त हो गया, अब मैं इस मनोरथ को भी पूर्ण करूँगा; यह धन मेरा है, तथा यह अन्य धन भी आगे मेरा ही हो जाएगा।" "उस शत्रु को मैंने मार डाला, और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा — मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही भोक्ता हूँ, मैं ही सिद्ध, बलवान तथा सुखी हूँ।" "मैं धनवान तथा उच्च कुल में जन्मा हूँ — मेरे समान अन्य कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, तथा आनन्द मनाऊँगा" — इस प्रकार अज्ञान से मोहित होकर, वे अनेक विचारों से भ्रमित, मोह-जाल में उलझे, तथा विषय-भोग में आसक्त होकर, अंततः किसी घोर नरक में गिर जाते हैं।
श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि अपने ही अहंकार में डूबे, हठी, धन के मद और अभिमान से परिपूर्ण, वे केवल नाम-मात्र के लिए, शास्त्र-विधि की उपेक्षा करते हुए, आडम्बरपूर्ण यज्ञ करते हैं। अहंकार, बल, दर्प, काम तथा क्रोध के वशीभूत होकर, ऐसे द्वेषपूर्ण व्यक्ति, अपने ही तथा दूसरों के शरीर में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं। ऐसे क्रूर, द्वेषी, नराधम व्यक्तियों को, मैं संसार-सागर में, बारम्बार केवल आसुरी योनियों में ही प्रक्षिप्त करता हूँ। हे कुन्तीपुत्र, आसुरी योनि को प्राप्त करके, जन्म-जन्मांतर तक मोहित होते हुए, वे मुझे कभी प्राप्त नहीं कर पाते, तथा इससे भी अधिक अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित आसुरी स्वभाव के इस विस्तृत चित्रण में, विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें किसी विशेष सामाजिक वर्ग अथवा बाहरी पहचान का उल्लेख नहीं है, अपितु यह पूर्णतः मन की एक आन्तरिक अवस्था का वर्णन है — अहंकार, असन्तोष, तथा अन्य प्राणियों के प्रति द्वेष। यही कारण है कि यह चेतावनी, किसी विशेष युग अथवा समाज तक सीमित नहीं रह जाती, अपितु आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक बनी रहती है, जितनी वह महाभारत-काल में थी — क्योंकि धन, सत्ता तथा भोग के प्रति अतृप्त लालसा, मानव-स्वभाव की एक शाश्वत प्रवृत्ति रही है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत प्रसिद्ध, व्यावहारिक उपदेश दिया, जो इस अध्याय का सार है — काम, क्रोध तथा लोभ — यह आत्मा का नाश करने वाला नरक का त्रिविध द्वार है; अतः इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए। जो मनुष्य इन अंधकार के तीनों द्वारों से मुक्त हो जाता है, हे कुन्तीपुत्र, वह अपनी आत्मा के कल्याण का कार्य करता है, तथा इस प्रकार परम गति को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति शास्त्र-विधि का त्याग करके, अपनी ही इच्छाओं के वशीभूत होकर आचरण करता है, वह न तो सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख, और न ही परम गति।
श्रीकृष्ण ने काम, क्रोध तथा लोभ के इस त्रिविध द्वार को समझाने के लिए एक अत्यंत स्पष्ट मनोवैज्ञानिक क्रम भी प्रस्तुत किया — इनमें से काम (अतृप्त इच्छा) ही मूल जड़ है, जिसके पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है, तथा इन दोनों के साथ ही, वस्तुओं और सम्पत्ति के प्रति अतृप्त आसक्ति, लोभ का रूप धारण कर लेती है। ये तीनों, एक-दूसरे को निरन्तर पुष्ट करते रहते हैं, तथा मनुष्य को क्रमशः अधिकाधिक अंधकार की ओर धकेलते जाते हैं — इसीलिए श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का "द्वार" कहा, क्योंकि ये स्वयं नरक नहीं, अपितु नरक की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं, जिन्हें समय रहते पहचानकर, साधक अपनी दिशा बदल सकता है।
अंत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया कि इसलिए, कर्तव्य और अकर्तव्य को निश्चित करने में, शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण होना चाहिए — शास्त्र की विधि को जानकर ही, तुम्हें इस संसार में अपने कर्म करने चाहिए। शास्त्र को प्रमाण मानने की यह शिक्षा, श्रीकृष्ण द्वारा इसलिए दी गई, ताकि साधक, अपनी ही क्षणिक इच्छाओं और भावनाओं को सत्य का अंतिम मापदंड न मान बैठे — क्योंकि आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति भी, अपने ही मन में, अपने कर्मों को पूर्णतः उचित ही मानते हैं। इसीलिए एक बाह्य, स्थिर मापदंड की आवश्यकता होती है, जो समय और व्यक्तिगत आसक्ति से परे हो — तथा यही भूमिका, सदियों से सिद्ध, ज्ञानी ऋषियों द्वारा रचित शास्त्र निभाते आए हैं। इस प्रकार, षोडश अध्याय में, श्रीकृष्ण दैवी और आसुरी सम्पदा के इस स्पष्ट विभाजन के द्वारा, मनुष्य के समक्ष एक अत्यंत स्पष्ट, नैतिक दर्पण प्रस्तुत करते हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य का बाह्य कर्म नहीं, अपितु उसकी आन्तरिक प्रेरणा — वह निःस्वार्थ करुणा से प्रेरित है, अथवा अहंकार और लोभ से — ही अंततः उसकी दैवी अथवा आसुरी प्रकृति का निर्धारण करती है। तथा काम, क्रोध और लोभ के इस त्रिविध द्वार से मुक्त होना, किसी भी साधक के लिए, दैवी सम्पदा की ओर अग्रसर होने का सबसे प्रथम तथा सबसे आवश्यक कदम है।
