षोडश अध्याय में दैवी और आसुरी सम्पदा के उस स्पष्ट विभाजन को सुनने के पश्चात्, अर्जुन के मन में एक अत्यंत सूक्ष्म, व्यावहारिक जिज्ञासा उठी। उन्होंने पूछा कि जो व्यक्ति, शास्त्र-विधि की उपेक्षा करके भी, श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं, हे कृष्ण, उनकी वह निष्ठा किस श्रेणी की मानी जाए — क्या वह सात्त्विक है, राजसिक है, अथवा तामसिक?
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि देहधारियों की श्रद्धा, उनके अपने ही स्वभाव से उत्पन्न होकर, तीन प्रकार की होती है — सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक; इसे सुनो। उन्होंने यह अत्यंत गहन, मर्मस्पर्शी सत्य भी प्रकट किया कि हे भारत, प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा, उसके अपने ही स्वभाव के अनुरूप होती है — मनुष्य, वस्तुतः श्रद्धामय ही है; जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, मनुष्य वैसा ही बन जाता है। सात्त्विक स्वभाव वाले लोग देवताओं की उपासना करते हैं, राजसिक लोग यक्षों तथा राक्षसों की, जबकि अन्य, तामसिक स्वभाव वाले लोग, प्रेतात्माओं तथा भूत-गणों की उपासना करते हैं।
श्रीकृष्ण का यह उत्तर, अर्जुन के मन में एक नई गहराई से प्रकाश डालता है — क्योंकि अब तक यह माना जाता रहा था कि किसी भी कर्म का शास्त्र-सम्मत होना ही उसकी सत्यता की एकमात्र कसौटी है, किंतु श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट करके, एक नई, भीतरी कसौटी भी जोड़ दी — मनुष्य की अपनी श्रद्धा ही, अंततः उसके स्वभाव और उसकी गति का निर्धारण करती है। यह सिद्धांत, मनुष्य को यह भी सिखाता है कि यदि वह अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता है, तो उसे केवल अपने बाह्य कर्मों को ही नहीं, अपितु अपने भीतर की श्रद्धा और विश्वासों को भी सजगतापूर्वक परिष्कृत करना होगा।
श्रीकृष्ण ने आगे उन व्यक्तियों की भी चेतावनी दी, जो शास्त्र-विधि से रहित, घोर तपस्या करते हैं, जो दम्भ तथा अहंकार से युक्त होकर, काम और आसक्ति के वेग से प्रेरित होते हैं — ऐसे अविवेकी व्यक्ति, जो शरीर के समस्त अवयवों को, तथा उसमें स्थित मुझको भी कष्ट पहुँचाते हैं, उन्हें आसुरी संकल्प वाला ही जानना चाहिए। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने भोजन, यज्ञ, तप तथा दान — इन चारों के भी तीन-तीन प्रकारों का विस्तृत वर्णन किया, जो इस अध्याय का सबसे व्यावहारिक तथा सर्वाधिक सुलभ अंश है।
उन्होंने भोजन के विषय में बताया कि जो भोजन आयु, बल, आरोग्य, सुख तथा प्रसन्नता को बढ़ाने वाला है, जो रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर तथा हृदय को प्रिय लगने वाला है, वह सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होता है। जो भोजन कटु, खट्टा, लवणयुक्त, अत्यंत गर्म, तीक्ष्ण, रूखा तथा दाहकारी है, वह राजसिक व्यक्तियों को प्रिय होता है, तथा दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाला होता है। तथा जो भोजन बासी, नीरस, दुर्गन्धयुक्त, जूठा, तथा अपवित्र है, वह तामसिक व्यक्तियों को प्रिय होता है।
भोजन के इस त्रिविध वर्गीकरण में, श्रीकृष्ण ने मानो यह भी संकेत दिया कि साधना केवल मन और बुद्धि तक सीमित नहीं है, अपितु यह मनुष्य के सबसे साधारण, दैनिक कर्मों — जैसे भोजन करना — तक भी फैली हुई है। जो व्यक्ति अपने शरीर को पवित्र, संतुलित आहार से पोषित करता है, वह स्वाभाविक रूप से ही अपने मन को भी सात्त्विक विचारों के लिए अधिक ग्रहणशील बना लेता है — इस प्रकार, शरीर और मन के बीच का यह सम्बन्ध, भारतीय योग-परम्परा के सबसे मौलिक सिद्धांतों में से एक माना जाता है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने यज्ञ के भी तीन प्रकार बताए — जो यज्ञ शास्त्र-विधि के अनुसार, फल की इच्छा से रहित, तथा यह दृढ़ निश्चय करते हुए कि यज्ञ करना ही कर्तव्य है, किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है। किंतु जो यज्ञ फल की कामना से, अथवा केवल दिखावे के लिए किया जाता है, हे भरतश्रेष्ठ, उसे राजसिक यज्ञ जानो। तथा जो यज्ञ शास्त्र-विधि से रहित, अन्न-दान से रहित, मंत्र-रहित, दक्षिणा-रहित, तथा श्रद्धा-रहित होता है, उसे तामसिक कहा गया है।
श्रीकृष्ण ने तप के भी तीन भेद अत्यंत सुंदरता से वर्णित किए — देवता, ब्राह्मण, गुरु तथा ज्ञानीजनों का सम्मान, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा — इसे शारीरिक तप कहा जाता है। जो वाणी उद्वेग उत्पन्न न करे, जो सत्य, प्रिय तथा हितकारी हो, तथा स्वाध्याय का अभ्यास भी — इसे वाणी का तप कहा जाता है। मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम तथा भाव-शुद्धि — इसे मानसिक तप कहा जाता है। यह त्रिविध तप, जब उत्तम श्रद्धा वाले, फल की इच्छा से रहित, अनुशासित पुरुषों द्वारा किया जाता है, तो उसे सात्त्विक कहा जाता है। जो तप सम्मान, प्रतिष्ठा तथा पूजा प्राप्त करने के उद्देश्य से, दिखावे के साथ किया जाता है, उसे राजसिक कहा जाता है — यह अस्थिर तथा क्षणभंगुर होता है। तथा जो तप मूढ़तापूर्ण हठ से, आत्म-पीड़न के द्वारा, अथवा दूसरों के विनाश के उद्देश्य से किया जाता है, उसे तामसिक कहा जाता है।
तप के इस त्रिविध वर्गीकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण, तप को केवल शारीरिक कष्ट सहने तक सीमित नहीं मानते — वाणी की मधुरता तथा सत्यता, तथा मन की शांति और संयम, ये भी उतने ही महत्वपूर्ण तप माने गए हैं, जितना शरीर का अनुशासन। यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति, बिना वन जाए अथवा कठोर शारीरिक तपस्या किए भी, केवल अपनी वाणी और मन पर संयम रखकर, इस त्रिविध तप का अभ्यास अपने दैनिक जीवन में ही कर सकता है।
दान के विषय में भी श्रीकृष्ण ने यह अत्यंत व्यावहारिक भेद बताया — जो दान, यह मानते हुए कि देना ही कर्तव्य है, किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है, जिससे किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा न हो, तथा जो उचित देश, काल तथा सुपात्र को दिया जाए, वह दान सात्त्विक माना जाता है। किंतु जो दान, प्रत्युपकार की आशा से, अथवा फल की कामना से, अथवा अनिच्छापूर्वक दिया जाता है, वह राजसिक माना जाता है। तथा जो दान, अनुचित देश-काल में, अपात्र व्यक्तियों को, बिना सम्मान के, अथवा तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक कहा गया है।
दान के इस वर्गीकरण में भी एक अत्यंत सूक्ष्म, किंतु महत्वपूर्ण भेद छिपा है — वह दान, जो केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए, अथवा भविष्य में किसी लाभ की आशा से दिया जाता है, चाहे वह कितना भी विशाल क्यों न हो, वह सच्चे अर्थों में दान नहीं माना जाता, अपितु एक प्रकार का व्यापार ही है। इसके विपरीत, एक निर्धन व्यक्ति द्वारा भी, बिना किसी अपेक्षा के, विनम्रतापूर्वक दिया गया एक छोटा-सा दान, कहीं अधिक सात्त्विक तथा मूल्यवान माना जाता है — क्योंकि यहाँ भी, दान की मात्रा नहीं, अपितु उसके पीछे का भाव ही निर्णायक है।
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उस अत्यंत रहस्यमय, पवित्र मंत्र-त्रय का भी उल्लेख किया, जो इस अध्याय के समापन का सार है — "ॐ तत् सत्" — यह ब्रह्म का त्रिविध नाम माना गया है; इसी के द्वारा, प्राचीन काल में, ब्राह्मण, वेद तथा यज्ञ रचे गए थे। इसीलिए, वेद-वेत्ताओं द्वारा, शास्त्रोक्त यज्ञ, दान तथा तप के कर्म, सदा "ॐ" के उच्चारण के साथ ही आरम्भ किए जाते हैं। "तत्" के उच्चारण के साथ, फल की इच्छा के बिना ही, मोक्ष के इच्छुक साधकों द्वारा, यज्ञ, तप तथा दान के विविध कर्म सम्पन्न किए जाते हैं। "सत्" शब्द का प्रयोग, सत्यता तथा श्रेष्ठता के अर्थ में किया जाता है, तथा हे पार्थ, "सत्" शब्द शुभ कर्मों के लिए भी प्रयुक्त होता है — यज्ञ, तप तथा दान में स्थिरता को भी "सत्" कहा जाता है, तथा इनसे सम्बन्धित कर्म को भी "सत्" ही कहा जाता है।
अंत में श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत गम्भीर चेतावनी दी, जो इस सम्पूर्ण अध्याय का निचोड़ है — जो भी आहुति दी जाती है, जो भी दान दिया जाता है, जो भी तप किया जाता है, तथा जो भी दृढ़ संकल्प लिया जाता है, यदि वह सब श्रद्धा से रहित है, हे पार्थ, तो उसे "असत्" ही कहा जाता है — वह न तो इस लोक में, और न ही परलोक में, किसी काम का होता है। इस प्रकार, सप्तदश अध्याय में, श्रीकृष्ण यह सिद्ध करते हैं कि किसी भी कर्म का बाह्य स्वरूप नहीं, अपितु उसके पीछे की श्रद्धा और भावना ही, उसे सात्त्विक, राजसिक अथवा तामसिक बनाती है — तथा श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी कर्म, चाहे वह कितना भी भव्य क्यों न प्रतीत हो, अंततः निरर्थक ही सिद्ध होता है।
