अध्याय १८

मोक्ष-संन्यास योग

सप्तदश अध्याय में श्रद्धा के उस त्रिविध रहस्य को समझने के पश्चात्, अर्जुन के मन में एक अंतिम, अत्यंत मूलभूत जिज्ञासा उठी, जिसने इस समस्त महान उपदेश के समापन की पृष्ठभूमि रची। उन्होंने पूछा कि हे महाबाहु हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास तथा त्याग, इन दोनों के तत्त्व को पृथक्-पृथक् रूप से जानना चाहता हूँ। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि ज्ञानीजन, कामना-प्रेरित कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं, जबकि विद्वान, समस्त कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। कुछ विद्वान कहते हैं कि कर्म को दोषयुक्त मानकर त्याग देना चाहिए, जबकि अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान तथा तप के कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए कहा कि यज्ञ, दान तथा तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं — ये अवश्य ही करने चाहिए, क्योंकि यज्ञ, दान तथा तप, ज्ञानीजनों को भी पवित्र करने वाले हैं। किंतु इन कर्मों को भी, आसक्ति तथा फल की कामना को त्यागकर ही करना चाहिए — यही, हे पार्थ, मेरा निश्चित तथा श्रेष्ठ मत है। नियत कर्तव्य-कर्म का त्याग करना उचित नहीं है — मोहवश उसका त्याग करना, तामसिक त्याग कहा गया है। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट के भय से, किसी कर्तव्य को दुःखद मानकर त्याग देता है, वह राजसिक त्याग करके, त्याग का फल कभी नहीं पाता। जो व्यक्ति, हे अर्जुन, केवल यह सोचकर कि यह करना ही कर्तव्य है, आसक्ति तथा फल को त्यागकर, नियत कर्म करता है, उसका त्याग सात्त्विक माना जाता है। सत्त्वगुण से युक्त, बुद्धिमान, संशयरहित त्यागी, अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता, तथा प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता — वस्तुतः देहधारी के लिए समस्त कर्मों का पूर्णतः त्याग करना सम्भव ही नहीं है, किंतु जो कर्मफल का त्याग कर देता है, उसे ही त्यागी कहा जाता है। जो त्याग नहीं करते, उनके लिए मृत्यु के पश्चात् कर्म का त्रिविध फल — इष्ट, अनिष्ट तथा मिश्रित — प्राप्त होता है, किंतु जिन्होंने त्याग कर दिया है, उनके लिए ऐसा कोई फल कभी नहीं होता। श्रीकृष्ण ने आगे सांख्य-सिद्धांत के अनुसार, कर्म के सम्पादन के पाँच कारणों का भी वर्णन किया — अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विविध करण (इन्द्रियाँ), नाना प्रकार की चेष्टाएँ, तथा पाँचवाँ कारण, दैव (ईश्वरीय व्यवस्था)। मनुष्य शरीर, वाणी तथा मन से जो भी कर्म करता है, चाहे वह उचित हो अथवा अनुचित, उसके ये पाँच कारण होते हैं। ऐसा होने पर भी, जो व्यक्ति अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण, शुद्ध आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मान बैठता है, वह वास्तव में सम्यक् दृष्टि नहीं रखता। जिस व्यक्ति में अहंकार का भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि दूषित नहीं है, वह चाहे इन सब प्राणियों का वध भी कर डाले, तो भी वह न तो उनका वध करता है, और न ही कर्म-बन्धन में बँधता है। श्रीकृष्ण ने आगे ज्ञान, कर्म तथा कर्ता — इन तीनों के भी, गुणों के भेद से, तीन-तीन प्रकार बताए। जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य, समस्त भिन्न-भिन्न प्राणियों में, एक ही अविभाज्य, अविनाशी तत्त्व को देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानो। जो ज्ञान, प्राणियों में, उनकी पृथकता के कारण, नाना प्रकार के भिन्न-भिन्न भावों को देखता है, वह राजसिक ज्ञान है। किंतु जो ज्ञान, बिना किसी युक्ति अथवा तत्त्व के, एक ही कार्य में इस प्रकार आसक्त रहता है मानो वही सब कुछ है, वह तामसिक कहा गया है। इसी क्रम में श्रीकृष्ण ने कर्म के भी तीन प्रकार बताए — नियत, आसक्ति-रहित, तथा राग-द्वेष से रहित, फल की इच्छा से रहित होकर किया गया कर्म सात्त्विक है। जो कर्म अत्यंत परिश्रम से, कामनाओं की पूर्ति के लिए, अथवा अहंकार से प्रेरित होकर किया जाता है, वह राजसिक कहा गया है। तथा जो कर्म मोहवश, परिणाम, हानि, हिंसा तथा अपनी ही सामर्थ्य का विचार किए बिना किया जाता है, वह तामसिक कहा जाता है। कर्ता के भी तीन प्रकार हैं — जो आसक्ति-रहित, अहंकार-रहित वाणी वाला, धैर्य तथा उत्साह से युक्त, तथा सिद्धि-असिद्धि में अविचलित है, वह सात्त्विक कर्ता है। जो रागयुक्त, फल की कामना करने वाला, लोभी, हिंसक स्वभाव वाला, अपवित्र, तथा हर्ष-शोक से युक्त है, वह राजसिक कर्ता है। तथा जो अस्थिर, अशिष्ट, हठी, धूर्त, द्वेषी, आलसी, विषादग्रस्त तथा दीर्घसूत्री है, वह तामसिक कर्ता कहा गया है। श्रीकृष्ण ने बुद्धि तथा धृति के भी तीन-तीन भेद बताए — जो बुद्धि, कर्म-अकर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय, तथा बन्धन-मोक्ष को भलीभाँति जानती है, वह सात्त्विक है। जो बुद्धि, धर्म-अधर्म तथा कर्तव्य-अकर्तव्य को अपूर्ण रूप से जानती है, वह राजसिक है। तथा जो बुद्धि, अंधकार से आच्छादित होकर, अधर्म को ही धर्म मान बैठती है, वह तामसिक है। जिस अविचल धृति के द्वारा, योग के सहारे, मनुष्य मन, प्राण तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करता है, वह धृति सात्त्विक है। जिस धृति से मनुष्य, फल की आसक्ति से, धर्म, अर्थ तथा काम को पकड़े रहता है, वह राजसिक है। तथा जिस धृति से मूढ़ व्यक्ति, निद्रा, भय, शोक, विषाद तथा मद को नहीं त्यागता, वह तामसिक है। श्रीकृष्ण ने सुख के भी तीन प्रकार बताए — जो सुख, निरन्तर अभ्यास से रमणीय होता है, तथा जो दुःख के अंत तक ले जाता है, जो आरम्भ में विष के समान, किंतु अंत में अमृत के समान प्रतीत होता है, तथा जो आत्म-बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। जो सुख इन्द्रिय-विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, जो आरम्भ में अमृत के समान, किंतु अंत में विष के समान होता है, वह राजसिक है। तथा जो सुख, आरम्भ से लेकर अंत तक, निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होकर, आत्मा को मोहित करता है, वह तामसिक कहा गया है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि इस पृथ्वी पर, अथवा देवताओं में भी, कोई भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने चारों वर्णों के कर्तव्यों का भी वर्णन किया, जो उनके अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित हैं — शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान तथा आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्तव्य हैं। शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध से पलायन न करना, दान तथा स्वामित्व-भाव — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्तव्य हैं। कृषि, गोपालन तथा वाणिज्य — ये वैश्य के स्वाभाविक कर्तव्य हैं; तथा सेवा-कर्म, शूद्र का स्वाभाविक कर्तव्य है। श्रीकृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य, अपने ही कर्तव्य में निरत रहकर, सिद्धि प्राप्त करता है — जिस परमात्मा से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, तथा जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसी की, अपने ही कर्तव्य के पालन द्वारा उपासना करके, मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण ने वह अत्यंत प्रसिद्ध उपदेश भी दोहराया — भलीभाँति किए गए पराए धर्म की अपेक्षा, गुणरहित अपना धर्म ही श्रेष्ठ है; अपनी प्रकृति द्वारा नियत कर्तव्य का पालन करते हुए, मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता। अपने जन्मजात कर्तव्य को, दोषयुक्त होने पर भी, नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि समस्त कर्म, धुएँ से अग्नि के समान, किसी न किसी दोष से आवृत्त ही रहते हैं। जिसकी बुद्धि सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जिसने अपनी आत्मा को वश में कर लिया है, तथा जिसकी कामनाएँ नष्ट हो चुकी हैं, वह संन्यास के द्वारा, नैष्कर्म्य-सिद्धि की उस परम अवस्था को प्राप्त होता है। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने उस ब्रह्म-प्राप्ति के अंतिम, क्रमिक मार्ग का भी वर्णन किया — शुद्ध बुद्धि से युक्त, धैर्यपूर्वक आत्मा को संयमित करते हुए, शब्दादि विषयों का त्याग करके, राग-द्वेष से मुक्त होकर; एकान्त का सेवन करते हुए, अल्पाहारी, वाणी, शरीर तथा मन को वश में रखते हुए, निरन्तर ध्यान-योग में तत्पर, वैराग्य का आश्रय लेकर; अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध तथा स्वामित्व-भाव को त्यागकर, ममता-रहित, शांत — ऐसा व्यक्ति ही ब्रह्म-भाव को प्राप्त होने योग्य बनता है। ब्रह्म-भूत होकर, प्रसन्न-चित्त, वह न तो शोक करता है, न कामना करता है — समस्त प्राणियों में समान भाव रखते हुए, वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है। भक्ति के द्वारा ही, वह मुझे यथार्थ रूप से जानता है, कि मैं वास्तव में क्या हूँ तथा कौन हूँ — तथा मुझे तत्त्वतः जानकर, वह तत्काल ही मुझमें प्रवेश कर जाता है। श्रीकृष्ण ने आगे यह भी आश्वासन दिया कि निरन्तर समस्त कर्म करते हुए भी, मेरी शरण लेकर, वह मेरी ही कृपा से, उस शाश्वत, अविनाशी धाम को प्राप्त होता है। मन से समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित करके, मुझे ही परम मानकर, बुद्धि-योग का आश्रय लेकर, निरन्तर मुझमें ही चित्त लगाओ। मुझमें चित्त लगाकर, तुम मेरी कृपा से समस्त विघ्नों को पार कर जाओगे — किंतु यदि अहंकारवश तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा। श्रीकृष्ण ने यहाँ अत्यंत स्पष्टता के साथ यह भी चेतावनी दी कि यदि तुम अहंकार के वशीभूत होकर यह सोचो कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा," तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ ही सिद्ध होगा — क्योंकि तुम्हारी ही प्रकृति तुम्हें युद्ध के लिए बाध्य कर देगी। हे कुन्तीपुत्र, अपने ही स्वभाव-जनित कर्म से बँधे हुए तुम, जिसे मोहवश नहीं करना चाहते, उसे भी विवशतापूर्वक करोगे ही। परमेश्वर, समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित होकर, अपनी माया के द्वारा, समस्त प्राणियों को, मानो किसी यंत्र पर आरूढ़ करके, घुमाता रहता है। हे भारत, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से, केवल उसी की शरण लो — उसकी कृपा से ही तुम परम शांति, तथा सनातन धाम को प्राप्त करोगे। श्रीकृष्ण ने अंत में कहा कि इस प्रकार, यह समस्त गोपनीयों से भी अधिक गोपनीय ज्ञान, मेरे द्वारा तुम्हें बता दिया गया है — इस पर भलीभाँति विचार करके, तुम जैसा चाहो, वैसा करो। उन्होंने पुनः एक बार, अपने सबसे परम, गोपनीय वचन को दोहराने की इच्छा प्रकट की — तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो, इसी कारण मैं तुम्हें वह परम हितकारी वचन कहूँगा। मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे ही यज्ञ अर्पित करो, मुझे ही प्रणाम करो — तुम मुझे ही प्राप्त होगे, यह मैं तुम्हें सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो। और तब, श्रीकृष्ण ने वह परम, अंतिम उपदेश दिया, जिसे सम्पूर्ण गीता का सार माना जाता है — समस्त धर्मों को त्यागकर, केवल मेरी ही शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। उन्होंने यह भी कहा कि इस उपदेश को, तप-रहित, भक्ति-रहित, तथा सुनने की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति को कभी मत बताना, और न ही उस व्यक्ति को, जो मेरी निंदा करता हो। जो व्यक्ति मेरे भक्तों में इस परम गोपनीय ज्ञान का प्रचार करेगा, वह मेरी परम भक्ति को सम्पन्न करके, निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा — उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला, तथा मुझे प्रिय, अन्य कोई मनुष्य इस संसार में नहीं होगा। जो व्यक्ति इस पवित्र संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजित हो जाऊँगा — यह मेरा दृढ़ मत है। तथा जो श्रद्धावान, द्वेष-रहित व्यक्ति, केवल इसे सुनेगा भी, वह भी मुक्त होकर, पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होगा। श्रीकृष्ण ने अंत में अर्जुन से पूछा — हे पार्थ, क्या तुमने इसे एकाग्र मन से सुना है? हे धनञ्जय, क्या तुम्हारा अज्ञान-जनित मोह नष्ट हो गया है? इसके उत्तर में, अर्जुन ने अत्यंत दृढ़ता से कहा — हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है, तथा मैंने स्मृति को पुनः प्राप्त कर लिया है। मैं संशयरहित, स्थिर होकर खड़ा हूँ — अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। अंत में, संजय ने धृतराष्ट्र से कहा कि इस प्रकार, मैंने वासुदेव तथा महात्मा पार्थ के बीच हुए इस अद्भुत संवाद को सुना, जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए। व्यास जी की कृपा से, मैंने यह परम, अत्यंत गोपनीय योग, स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुख से, प्रत्यक्ष सुना है। हे राजन्, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत, पवित्र संवाद को बार-बार स्मरण करके, मैं बार-बार हर्षित होता हूँ — तथा हरि के उस अत्यंत अद्भुत विश्वरूप को भी बार-बार स्मरण करके, मुझे अत्यंत विस्मय होता है, हे राजन्, और मैं बार-बार आनंदित होता हूँ। संजय ने अंत में वह अमर, कालजयी निष्कर्ष सुनाया, जो सम्पूर्ण महाभारत की भी आत्मा मानी जाती है — जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं श्री, विजय, ऐश्वर्य तथा अचल नीति है — यही मेरा मत है। इस प्रकार, अष्टादश तथा अंतिम अध्याय में, श्रीकृष्ण इस सम्पूर्ण गीता-उपदेश का समापन, संन्यास और त्याग के सूक्ष्म भेद से करते हैं, फिर ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति तथा सुख के त्रिगुणात्मक विश्लेषण से होते हुए, वर्णाश्रम-धर्म के व्यावहारिक सिद्धांत तक पहुँचते हैं — और अंततः, उस परम, सर्वाधिक गोपनीय उपदेश पर विराम लेते हैं, जिसे सम्पूर्ण गीता का हृदय माना जाता है — "समस्त धर्मों को त्यागकर, मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।" अर्जुन का विषाद, जो प्रथम अध्याय में उनके धनुष-बाण के त्याग के साथ आरम्भ हुआ था, अब अंततः, दृढ़ निश्चय और कर्तव्य-पालन के संकल्प के साथ समाप्त होता है — तथा यहीं से आरम्भ होगा वह महायुद्ध, जिसकी भीषण कथा आगे द्रोण, कर्ण, शल्य तथा अन्य पर्वों में वर्णित होने वाली है।